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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1142, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1142

हे शोभनधन वाले वरुण! सागर में रहकर भी प्यासे मुझ स्तोता को सुखी बनाओ एवं
मुझ पर दया करो. (४)
यत्किं चेदं वरुण दैव्ये जनेऽभिद्रोहं मनुष्या३श्चरामसि.
अचित्ती यत्तव धर्मा युयोपिम मा नस्तस्मादेनसो देव रीरिषः.. (५)
हे वरुण! हम मनुष्य देवों के प्रति जो द्रोह करते हैं अथवा अज्ञानता के कारण तुम्हारे
जिस यज्ञकर्म को भूल जाते हैं, उन पापों के कारण हमें मत मारना. (५)
सूक्त—९० देवता—वायु
प्र वीरया शुचयो दद्रिरे वामध्वर्युभिर्मधुमन्तः सुतासः.
वह वायो नियुतो याह्यच्छा पिबा सुतस्यान्धसो मदाय.. (१)
हे वीर वायु! अध्वर्युगण द्वारा तुम्हारे लिए शुद्ध एवं मधुर सोमरस दिया जाता है. तुम
अपने घोड़ों को रथ में जोड़ो, हमारे सामने आओ एवं मादकता के हेतु हमारा निचोड़ा हुआ
सोमरस पिओ. (१)
ईशानाय प्रहुतिं यस्त आनट् शुचिं सोमं शुचिपास्तुभ्यं वायो.
कृणोषि तं मर्त्येषु प्रशस्तं जातोजातो जायते वाज्यस्य.. (२)
हे सबके स्वामी वायु! तुम्हें जो उत्तम आहुति देता है एवं हे सोमपानकर्त्ता वायु! जो तुम्हें
पवित्र सोमरस देता है, उसे तुम सभी मनुष्यों में प्रसिद्ध बनाते हो. वह सर्वत्र प्रसिद्ध होकर
धन का पात्र बनता है. (२)
राये नु यं जज्ञतू रोदसीमे राये देवी धिषणा धाति देवम्.
अध वायुं नियतः सश्चत स्वा उत श्वेतं वसुधितिं निरेके.. (३)
इस द्यावा-पृथिवी ने वायु को धन के लिए उत्पन्न किया है एवं प्रकाशयुक्त स्तुति धन के
लिए ही वायु देव को धारण करती है. इस समय वायु के अश्व उनकी सेवा करते हैं एवं
दरिद्रता की स्थिति में वे घोड़े धनप्रदाता वायु को हमारे यज्ञ में लाते हैं. (३)
उच्छन्नुषसः सुदिना अरिप्रा उरु ज्योतिर्विविदुद्दीध्यानाः.
गव्यं चिदूर्वमुशिजो वि वव्रुस्तेषामनु प्रदिवः सस्रुरापः.. (४)
शोभन दिन लाने वाली पापरहित उषाएं अंधकार मिटाएं एवं दीप्तिसंपन्न होकर वायु की
कृपा से विस्तृत प्रकाश पावें. वायु की स्तुति करने वाले अंगिराओं ने गोधन प्राप्त किया.
प्राचीन जल अंगिराओं के पीछे बहे. (४)
ते सत्येन मनसा दीध्यानाः स्वेन युक्तासः क्रतुना वहन्ति.
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