ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1050, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तेदिन्द्रं न स्रवतो गृणन्ति नि युध्यामधिमशिशादभीके.. (२४)
जिन सुदास का यश विस्तृत द्यावा-पृथिवी में फैला है, जिन्होंने दाता बनकर प्रत्येक श्रेष्ठ
व्यक्ति को धन दिया है, उन सुदास की स्तुति सातों लोक इंद्र के समान करते हैं. नदियों ने
युद्ध में युध्यामधि नामक शत्रु को मार डाला था. (२४)
इमं नरो मरुतः सश्चतानु दिवोदासं न पितरं सुदासः.
अविष्टना पैजवनस्य केतं दूणाशं क्षत्रमजरं दुवोयु.. (२५)
हे नेता मरुतो! पिता दिवोदास के ही समान राजा सुदास की भी सेवा करो एवं पिजवन
के पुत्र सुदास के घर की रक्षा करो. सुदास की सेना जरारहित एवं अविनाशी हो. (२५)
सूक्त—१९ देवता—इंद्र
यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम एकः कृष्टीश्च्यावयति प्र विश्वाः.
यः शश्वतो अदाशुषो गयस्य प्रयन्तासि सुष्वितराय वेदः.. (१)
जो तीखे सींगों वाले एवं भयानक बैल के समान अकेले ही सारे शत्रुओं को भगा देते हैं
एवं जो यज्ञ न करने वाले बहुत से लोगों के घर छीन लेते हैं, वे ही अतिशय सोमरस निचोड़ने
वाले को धन देते हैं. (१)
त्वं ह त्यदिन्द्र कुत्समावः शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्ये.
दासं यच्छुष्णं कुयवं न्यस्मा अरन्धय आर्जुनेयाय शिक्षन्.. (२)
हे इंद्र! तुमने उस समय शरीर से शुश्रूषा पाकर युद्ध में कुत्स की रक्षा की थी, जिस
समय तुमने अर्जुनी के पुत्र कुत्स को धन देते हुए दास, शुष्ण और कुयव को वश में किया था.
(२)
त्वं धृष्णो धृषता वीतहव्यं प्रावो विश्वाभिरूतिभिः सुदासम्.
प्र पौरुकुत्सिं त्रसदस्युमावः क्षेत्रसाता वृत्रहत्येषु पूरुम्.. (३)
हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम अपने धर्षक वज्र द्वारा रक्षा के सभी साधन प्रयोग में लाकर हव्य
देने वाले सुदास को बचाओ. भूमि के कारण होने वाले युद्ध में पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु एवं
पुरु की रक्षा करो. (३)
त्वं नृभिर्नृमणो देववीतौ भूरीणि वृत्रा हर्यश्व हंसि.
त्वं नि दस्युं चुमुरिं धुनिं चास्वापयो दभीतये सुहन्तु.. (४)
हे यज्ञ के नेताओं द्वारा स्तुतियोग्य इंद्र! तुमने संग्राम में मरुतों के साथ मिलकर बहुत से
शत्रुओं को मारा था. हे हरि नामक अश्वों के स्वामी इंद्र! तुमने दभीति के कल्याण के लिए
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