रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)
Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished520 पृष्ठ
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द्वितीयोऽङ्कः 183
वासवदत्ता—( फलकं निर्दिश्य ) अज्जउत्त ! एसा वि जा अवरा
तुह समीवे आलिहिदा, ता किं अज्जवसंतअस्स विन्नाणं ? (क)
राजा—( सवैक्लव्यस्मितम् ) देवि ! अलमन्यथा गृहीत्वा । इयं
हि कापि कन्यका १ स्वचेतसैव परिकल्प्य आलिखिता, न तु
दृष्टपूर्वा ।
विदूषक—सच्चं सबामि बम्हसुत्तेण जइ कदावि अम्हेहिं
ईदिसो दिट्ठपुव्वा ! (ख)
काञ्चनमाला—( अपवार्य ) भट्टिणि ! कदावि ईदिसं २घुण-
क्खरं संभवदि ३ज्जेव्व । ता अलं कोवेण । (ग)
वासवदत्ता—( अपवार्य ) अइ उज्जुए, एदस्स वल्लभच्चिदाइं
ण जानासि ! बसंतओ क्खु एसो ! ( प्रकाशं राजानं प्रति ) अज्ज-
उत्त ! मम उण एदं चित्तं पेक्खिअ४ सीसवेदणा