रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)
Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary
कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा
भाषाटीकासहिता । १५
बाहुभ्यां ताडयेद्गाढं क्षुद्गारो बन्धसंज्ञकः ॥५२॥
टी०—स्त्री के दोनों पगों को अपने पसवाड़े पर रख लिङ्ग से
योनि को ताडन करै । और दोनों हाथों से दृढ ताडन करै, यह क्षुद्रारा-
सन कहा है ॥ ५२ ॥
धेनुकासनलक्षणम्—
सुप्तां स्त्रियं समालिंग्य स्वयं सुप्तो रमेत्पुनः ।
यल्लिगं चालयेद्योनौ बन्धोऽयं धेनुकः स्मृतः ॥५३॥
टी०—सोती हुई स्त्री को आलिङ्गन कर आप भी सोता हुआ जिस
हेतु योनि में लिंग चलाता हुआ कामी रमण करता है इस लिये धेनुक
नाम का यह आसन कहा गया है ॥ ५३ ॥
उत्कण्ठासनलक्षणम्—
नारीपादौ च हस्तेन धारयेद्गलके पुनः ।
स्तनार्पितकरः कामी बन्धश्चोत्कण्ठसंज्ञकः ॥५४॥
टी०—कामी पुरुष के दोनों पगों को हाथ से कण्ठ में रख फिर
अपने दोनों हाथों को स्तन पर धरै, यह उत्कण्ठासन है ॥ ५४ ॥
अथ सिंहासनबन्धलक्षणम्—
स्वीये जङ्घाद्वये कामी कृत्वा योषित्पदद्वयम् ।
स्तनौ धृत्वा रमेन्नारीबन्धः सिंहासनो मतः ॥५५॥
टी०--कामी पुरुष अपने दोनों जंघे पर स्त्री के दोनों पैरों को रख-
कर स्तनों को मर्दन कर स्त्री से रमण करै, यह सिंहासन बन्ध कहा है ॥
अथ रतिनागबन्धलक्षणम्—
पीडयेदुरुयुग्मेन कामुकः कामिनीं यदि ।
रतिनागः समाख्यातः कामिनीनां मनोहरः ॥५६॥
टी०—कामी पुरुष स्त्री को दोनों उरुओं से पीड़ित कर उसके साथ
१६ रतिमञ्जरी—
रमण करै । यह कामिनियों के मनको हरने वाला रतिनाग नाम आसन
कहा है ॥ ५६ ॥
अथ विद्याधरासनलक्षणम्—
नार्याश्चोरुयुगं धृत्वा कराभ्यां ताडयेत्पुनः ।
रमयेन्निर्भरं कामी बन्धो विद्याधरो मतः ॥५७॥
टी०—कामी पुरुष दोनों हाथों से स्त्री के दोनों जङ्घे को धारण कर
फिर योनि ताडन करता हुआ दृढ रमण करै, यह विद्याधर नाम आसन
कहा है ॥ ५७ ॥
अथ कामिजनप्रशंसा—
स्त्रियमानीय यत्नेन विधृत्य चरणद्वयम् ।
वशं नयति यः कामी रतिशास्त्रविचक्षणः ॥५८॥
टी०—जो कामी पुरुष यत्न से स्त्री को लाकर उसके दोनों चरणों
को धर कर वशीभूत करता है, वह रतिशास्त्र का पण्डित है ॥ ५८ ॥
रतिशास्त्रं समाकर्ण्य बन्धान् पद्मादिषोडश ।
नानाविधरतिं कुर्यात्कामिन्या कामुको जनः ॥५९॥
टी०—कामी पुरुष रतिशास्त्र को सुनकर पद्मादि सोलह आसन को
जानकर कामिनी के साथ अनेक प्रकार से रति करै ॥ ५९ ॥
सर्वशास्त्रार्थवक्त्रेण जयदेवेन धीमता ।
मञ्जरी रतिशास्त्रस्य कृत्वा नीता समाप्तताम् ॥६०॥
टी०—सब शास्त्रों का अर्थ मुख में है जिसके ऐसा बुद्धिमान् जय-
देव कवि ने रतिशास्त्र की मञ्जरी समाप्त की ॥ ६० ॥
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