रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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उसके बाल बिखर जाते हैं, काम के आवेश में चुम्बन करती हुई
काटती है, हँसती है, लम्बे श्वास छोड़ती हुई छाती रगड़ती है ।
ये सब उसकी रतिरस स्फोटक कलायें हैं ।
कभी-कभी वह उन्मत्त होकर कहती है—क्या समझ कर मुझे
नीचे पटक रक्खा था ? क्या कमजोर समझ रक्खा था ? देखो,
उसी का यह बदला है । योद्धा जिस प्रकार रण में ललकारते हैं
उसी प्रकार यह भी ललकारती, भय दिखाती, हँसती, तिरस्कार
करती हुई मदनयुद्ध में पुरुष की तरह प्रहार करती है। जब उसका
जोश कुछ ठण्डा होता है तब लज्जा से उसका सिर नीचे झुक जाता
है और रतिश्रम से थक कर विश्राम की इच्छा से, पुरुष की भाँति
मृदु उपचार करने लगती है ।
विपरीतासन से रतिक्रिया करते समय स्त्री जिन-जिन तरीकों
से काम ले, पुरुष को स्मरण रखना चाहिए कि स्त्री उन्हीं-उन्हीं
उपायों से तृप्त हो सोती है । अतः उन्हीं उपायों से काम लिया करे
तो दोनों को अपूर्व आनन्द मिलेगा ।
सुवर्णनाभ आचार्य का मत है कि यदि स्त्री का रतिरहस्य
जानना हो तो पुरुष को ध्यान रखना चाहिए कि सम्भोगकाल में
जिस अंग को स्पर्श करने से स्त्री आँख की पुतली घुमावे, उसी
अंग में काम का वास है । अतः उसी अंग का मर्दन, स्पर्शन बार
बार करे, इससे स्त्री शीघ्र सन्तुष्ट और द्रवित होगी ।
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