रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
समीक्षा भाग ७६
'कंचन-मंदिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाय सदा झलकयैत ।
प्रात ही ते सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत ।
जद्यपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मघवा ललचैयत ।
ऐसे भए तौ कहा रसखानि जो साँवरे ग्वार सो नेह न लैयत ॥'
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'कहा रसखानि सुखसम्पत्ति सुमार कहा,
कहा तन जोगी ह्वै लगाए अंग छार को ।
कहा साधे पंचानल कहा सोए बीच जल,
कहा जीति लाए राज सिन्धु आर-पार को ।
जप बार बार तप सगम बयार व्रत,
तीरथ हजार अरे बूझत लवार को ।
कीन्हौ नही प्यार नही सैयौ दरबार चित,
चाह्यो न निहार्यो जो पै नन्द के कुमार को ॥'
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'कंचन के मंदिरनि दीठि ठहराति नाहिं,
सदा दीपमाल लाल मानिक उजारे सो ।
और प्रभुताई अब कहाँ लौ बखानौ, प्रति,
हारन की भीर भूप हटत न द्वारे सो ।
गंगाजी मैं न्हाइ मुक्ताहलहू लुटाइ, वेद,
बीस बार गाई ध्यान कीजत सबारे सो ।
ऐसे ही भए तौ नर कहा रसखानि जो पै,
चित्त दै न कीनी प्रीति पीतपटवारे सो ॥'
इन उद्धरणो से यह स्पष्ट हो जाता है कि रसखान के मन में अपने आराध्य
के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण, विश्वास एवं अनुराग है । किन्तु अन्य कृष्ण-भक्तो
की भाँति इनका हृदय सकीर्ण नही है । सूरदास कृष्ण को छोडकर अन्य देव
की उपासना इसी प्रकार हास्यास्पद समझते है जिस प्रकार कामधेनु को छोड-
कर छेरी का दूध निकालना । पर रसखान मे यह सकीर्णता नही है । ये यद्यपि
कृष्ण के प्रति अपनी पूर्ण आस्था प्रकट करते है, पर शिव और गंगा के प्रति
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भी इनके मन मे श्रद्धा भाव है । शिव की स्तुति करते हुए ये कहते
हैं—
'यह देखि धतूरे के पात चबात तौ गात सो धूलि लगावत हैं ।
चहुँ ओर जटा अटकै लटकै फनि सो कफनी फहरावत हैं ।
रसखानि जेई चितवै चित दै तिनके दुख-दुन्द भजावत हैं ।
गज-खाल कपाल की माल विसाल सो गाल बजावत आवत हैं ॥'
गंगा-महिमा से सम्बद्ध इनके दो सवैये उपलब्ध हैं । वे ये हैं—
१. 'इक ओर किरीट लसै दूसरी दिसि नागन के गन गाजत री ।
मुरली मधुरी धुनि अधिक ओठ पै अधिक नाद से बाजत री ।
रसखानि पीतम्बर एक कँधा पर एक बघम्बर राजत री ।
कोउ देखउ सगम लै बुड़की निकसे यहि भेख सो छाजत री ॥'
२. 'वेद की औषध खाई कछु न करै बहु सजम री मुनि मोसे ।
तो जल-पान कियो रसखानि सजीवनि जानि लियो रस तोसे ।
ऐ री सुधामई भागीरथी नित पथ्य अपथ्य बनै तोहि पोसे ।
आक धतूरो चबात फिरै विष खात फिरै शिव तेरे भरोसे ॥'
इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि रसखान वल्लभाचार्य की परम्परा में
आते हैं, पर ये इस परम्परा के भक्तो की भांति नियमो का कठोर पालन
करके नहीं चले हैं । नियमो की अपेक्षा इनकी भक्ति पद्धति भावो पर अधिक
आधृत है । यही कारण है कि इनके मन मे जितनी कृष्ण के प्रति आस्था है,
उतनी ही अन्य देवताओ के प्रति विशेषतः गंगा और शिव के प्रति । उदार मन
की यह उदारता रसखान के अतिरिक्त न तो अन्य कृष्ण-भक्तो मे मिलती है
और न स्वच्छन्दवादी कवियो मे ।
: ६ : -
रसखान की रस-योजना
रस काव्य की आत्मा है, अतः प्रत्येक सजीव काव्य के लिए रस-योजना
अनिवार्य है। भावपूर्ण कवियो के काव्य मे रस-योजना श्रमसाध्य नही होती,
वरन् स्वाभाविक होती है। विविध रसो की योजना रसखान का ध्येय नही है।
ये तो भक्त है और भक्ति के आवेश मे आकर ही इनकी वाणी फूटी है।
इनकी भक्ति माधुर्य भाव की है। अतः श्रृंगार रस की योजना ही इनके काव्य
मे पाई जाती है। भक्त होने के नाते इनकी इस श्रृंगारिक योजना को अलौ-
किक श्रृंगार के अन्तर्गत ही परिगणित किया जायेगा।
श्रृंगार रस के दो भेद होते है—सयोग श्रृंगार और वियोग श्रृंगार ।
इन्हे ही क्रमशः सम्भोग श्रृंगार और विप्रलम्भ श्रृंगार कहते है।
संयोग श्रृंगार
सयोग श्रृंगार के अन्तर्गत नायक और नायिका के मिलन की अवस्था एवं
तज्जन्य आनन्द का वर्णन होता है। यह मिलन-अवस्था एकदम नही आती,
बल्कि इसे प्राप्त करने के लिए दोनो को अनेक सोपान पार करन पड़ते है।
पहले वे अचानक मिलते हैं, एक-दूसरे को देखते है और पारस्परिक रूप का
लावण्य उन्हे सान्निध्य प्राप्त करने को प्रेरित करता है। तत्पश्चात् उन दोनो
की प्रेम-क्रीडाएँ चलती है। सयोग श्रृंगार के अन्तर्गत मुख्यतया तीन बातो का
वर्णन किया जाता है—
१ रूप-वणन ।
२ प्रेम-व्यापार का वर्णन ।
३ नायिका-भेद-वर्णन ।
१. रूप-वर्णन रूप अथवा सौन्दर्य के प्रति आकर्षण प्रेम का प्रथम सोपान
है। नायक नायिका के सौन्दर्य से और नायिका नायक के सौन्दर्य के कारण
ही दोनो एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। हिन्दी मे विशेषत. रीतिकालीन
८२ रसखान-ग्रन्थावली
साहित्य मे—केवल नायिका के सौन्दर्य का ही वर्णन किया गया है। यह वर्णन
एकागी है। रसखान ने नायक और नायिका—कृष्ण और राधा—दोनो के
सौन्दर्य का वर्णन किया है। कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए इन्होंने
बताया है कि उस नटवर कृष्ण के गले में मोतियों की माला पडी हुई है।
उनकी घूंघरवारी केश-राशि लटक रही है। अंग के प्रत्येक भाग मे जड़ाऊ
आभूषण और सिर पर जरी वाली पगडो सुशोभित है। ऐसे सौन्दर्य के दर्शन
पूर्ण पुण्यो के कारण ही हुआ करते हैं—
'मोतिन माल बनी नट के लटकी लटवा लट घूँघरवारी ।
अग ही अग जराव लसै अरु सीस लसै पगिया जरतारी ।
पूरब पुन्यनि तें रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी ।
चार्यो दिसानि की लै छवि आनि कै झाँके झरोखे मैं बाँके विहारी ॥'
कृष्ण जब शाम को गाय चराकर अपने अन्य साथियो के साथ वन से
वापिस लौटते है तो उस समय उनका जो सौन्दर्य होता है, उसे देखकर ब्रज
की वनिताएँ अपने सारे दिन की थकान को भूल जाती है—
'आवत हैं वन तें मनमोहन गाइन संग लसै ब्रज-ग्वाला ।
वेनु बजावत गावत गीत अभीत इतैं करिगो कछु ख्याल ।
हेरत हेरि कहै चहू ओर तें झाँकि झरोखन तें ब्रज-बाला ।
देखि सु आनन को रसखानि तज्यो सब द्योस को ताप-कसाला ॥'
कृष्ण जितने सुन्दर है, उनकी वाणी में उतना ही माधुर्य है और कुंजो मे
घूमने फिरने की उतनी ही आकर्षणमयी आतुरता है। जो भी गोपी उनके
सौन्दर्य को तथा उनकी सुन्दर चेष्टाओ को देख लेती है, वह उनके सौन्दर्य-
सागर मे डूबे बिना नही रह पाती —
'अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है ।
लखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गांठन खोलत है ।
सुन री सजनी अजबेलो लला वह कुंजनि कु जनि डोलत है ।
रसखानि लखें मन वूड़ि गयौ मधि रूप के सिन्धु कलोलत है ॥'
जो भी गोपी कृष्ण के सौन्दर्य को देख लेतो है, वह दीवानी बन जाती है,
कृष्ण का सौन्दर्य उसके हृदय मे अटक जाता है—
समीक्षा भाग ८३
'तैं न लख्यो जब कुंजनि तें बनिर्क निकस्यौ भटक्यौ मटक्यौ री ।
सोहत कैसो हरा टटक्यौ उठ कैसो किरीट लसै लटक्यौ री ।
को रसखानि फिटै फटक्यौ हटक्यौ ब्रजलोग फिरै भटक्यौ री ।
रूप सबै हरि वा नट को हियरे अटक्यौ अटक्यौ अटक्यौ री ।।'
जितना मधुर कृष्ण का शरीरगत सौन्दर्य है, उतना ही आकर्षक उनका
चेष्टागत सौन्दर्य भी है । उनके वक्र नेत्रो की मार इतनी पैनी और प्रभावशाली
है कि जिस गोपी पर भी वह पड जाती है, वह अपनापन भूल जाती है और
क्षणभर को भी कृष्ण-स्मृति को नही छोड़ पाती—
'नैननि बक बिसाल के बाननि झेलि सकै अरु कौन नवेली ।
बेधत हैं हिम तीक्ष्न कोर सुमार गिरी तिय कोटिक हेली ।
छोडै नही छिनहूँ रसखानि सु लागी फिरै द्रुम सो जनु बेली ।
रोरि परी छबि की ब्रजमंडल कुंडल गंडनि कु तल केली ।।'
कृष्ण की वाणी और उनकी चंचल दृष्टि विलक्षण है । उनके कपोलो पर
कुंडलो की छवि हाथी के गडस्थल पर पड़ी हुई छवि की भाँति अद्वितीय है ।
जब वे वृक्ष की डाली पकड़कर त्रिभंगिमा से खडे होते हैं तो उस समय उनकी
जो शोभा होती है, उसका वर्णन नही किया जा सकता । उनकी सरस मुस्कान
तो वशीकरण मत्र है ही—
'अलबेली विलोकन बोलनि औ अलबेलियै लोल निहारन को ।
अलबेली सी डोलनि गडनि पै छवि सों मिलि कु डल बारन की ।
भटू ठाढौ लख्यो छवि कैसे कहौ रसखानि गहे द्रुम डारन को ।
हिय मैं जिय मैं मुसकानि रसी गति को सिखवै निरवारन की ।।'
उनके विशाल नेत्र सुख देने वाले हैं, उनके कपोल पुष्ट हैं, वाणी मे
माधुर्य है, हँसी मे आकर्षण है, मुख मे चन्द्रमा जैसी सुन्दरता ओर स्निग्धता है ।
इस सौन्दर्य-राशि को देखकर सभी गोपियाँ इसकी मनोहरता पर मोहित हो
जाती है—
'बाँकी बडी अँखियां बडरारे कपोलनि बोलनि की कल वानी ।
सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख मूरति रंग सुधारस-सानी ।
ऐसी नवेली ने देखे कहूँ ब्रजराज लला अति ही सुखदानी ।
डोलति है बन बीथिन मे रसखानि मनोहर रूप लुभानी ।।'
८४ रसखान-ग्रन्थावली
रसखान ने जिस प्रकार कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन किया है, उसी प्रकार
राधा के सौन्दर्य के भी अनेक चित्र चित्रित किये है । राधा के नेत्रो मे वह
सुन्दरता तथा मादकता है, मानो ब्रह्मा ने ससार को प्यासा जानकर उसकी
तृप्ति के लिए उनके नेत्रो मे सुधा-सागर भर दिया है। मुख इतना सुन्दर है
जैसे अपने समस्त अमृत-सार को सजोकर चन्द्रमा स्वय उपस्थित हो गया हो ।
उसके शरीर का गठन ऐसा है जैसे सोने मे म णिमुक्ताओ को जड़ने के लिए
कुशल जड़िया यौवन ने रत्न जटने के लिए स्थान-स्थान पर सुन्दर स्थान निर्धा-
रित किये हुए हो। उसके अधरो की लाली काम-कामना के समान सुशोभित
है। उसकी नासिका का छिद्र उस भौरे के समान है जिसमे पड़कर ज्ञान की
नौका का गर्व नष्ट हो जाता है और उसकी मनोहर चिबुक पर तो सैकड़ो रति
और रम्भा की शोभा को न्योछावर किया जा सकता है—
'कैधो रसखान रस कोम दृग प्यास जानि,
आनि कै पियूप कूप कीन्हौ विधि चंद घर ।
कैधो मनि मानिक बैठारिबै को कंचन मै,
जड़िग्या जोवन जिन गढ़िया सुघर घर ।
कैधौ काम कामना के रंगत अधर चिन्ह,
कैधौ यह भौर ज्ञान वोहित गुमान हर ।
एरी मेरी प्यारी द्युति कोटि रति रम्भा की,
वारि डारौ तेरी चित्तचोरनि चिबुक पर ॥'
राधा का मुख इतना सुन्दर है कि उसकी सुन्दरता का किसी भी प्रकार
वर्णन नही किया जा सकता । उसका सौन्दर्य प्रकाशित करने वाला है । उसके
रूप का बोध वही व्यक्ति कर सकता है जिसने नक्षत्रों की अनुपम शोभा को
देखा है । उसके मस्तक पर लगा हुआ टीका इस प्रकार सुशोभित हो रहा है
मानो चन्द्रमा अपनी गोद मे मगल को लिये हुए हो —
'श्री मुख कौ न बखान सकै वृषभान सुता जू को रूप उजारो ।
हे रसखान तू ज्ञान सभार तरैनि निहार जु रीझनहारो ।
चारु सिन्दूर को लाल रसाल लसै ब्रज बाल को भाल टिकारो ।
गोद मे मानौं विराजत है घनश्याम के सारे की सारे को सारो ॥'
समीक्षा भाग ८५
राधा का यह स्वाभाविक सौन्दर्य सौन्दर्य-साधक उपकरणो से विभूषित
होता है तो उसकी शोभा द्विगुणित हो जानी है। उसका गहरे लाल गुलाल के
समान दुकूल गुलाब के लाल फूल की भाँति शोभायमान है। उसकी काली
केश-राशि भौगे के समान सुशोभित है। काले रेशम की डोरियों मे बँधे हुए गुंज
पलाश-पुष्प की भाँति शोभा-सम्पन्न हैं। उसके मोती कदम्ब और आम की मं-
रियो के समान शोभायमान है। उसकी वाणी मे इतना माधुर्य है कि उसके
वचनो को सुनकर कोयल भी लज्जित हो जाती है—
'अति लाल गुलाल दुकूल ते फूल अली । अलि कुंतल राजत है ।
मखतूल समान के गंज धरनि मै किसुक की छवि छाजत है ।
मुकता के कदम्ब ते अम्ब के मौर सुने सुर कोकिल लाजत है ।
यह श्रावनि प्यारी जु की रसखानि बसन्त-सी आज विराजत है ।"
जब राधा न अपने शरीर पर चन्दन का लेप कर लिया तो वह ऐसी प्रतीत
होने लगी मानो चन्द्रमा की पत्नियो तारिकाओ को लज्जित करने के लिए सब
प्रकार से अपनी सात्विक शोभा को बाहर निकालकर वह सुधा की मानसपुत्री
बैठी हो। उसके कुचो के बीच मे हार का चन्दा इस प्रकार सुशोभित हो रहा
था जैसे सौन्दर्य को ही उसके शरीर मे जड दिया गया हो, अथवा वह दृग-वाणों
का धाव दमक रहा हो, अथवा-श्वेत पर्वत के संधि-स्थान मे कोई जलाशय हो —
'तन चन्दन खोर के बैठी भटू रही आजु सुधा की सुता मनसी,
मनो इन्दुबधून लजावन कौ सब ज्ञानिन काढि धरी गन-सी ।
रसखानि विराजति चौकी कुचौ बिच उत्तमताहि जरी तन-सी ।
दमकै दृग-वान के घायन कौ गिरि सेत के संधि के जीवन-सी' ।
कही-कही राधा-सौन्दर्य का अत्युक्तिपूर्ण वर्णन श्री रसखान ने किया है—
'वासर तूँ जु कहूँ निकरै रवि को रथ माँझ अकास अरै री ।
रैन महै गति है रसखानि छुपाकर आँगन तै न टरै री।
द्यौस निस्वास चल्यौई करै निसि द्यौस की आसन पाय घरै री ।
तेरी न जात कछू दिन राति विचारे बटोही की बाट परै री ।'
हे राधा ! यदि तू दिन मे अपने घर से बाहर निकल जाती है तो तेरे
सौन्दर्य से सूर्य इतना चकित हो जाता है कि उसका रथ आकाश मे ही रुक
८६ रसखान-ग्रन्थावली
जाता है, अर्थात् सूर्य अपनी गति भूलकर एकटक तुझे ही देखता रह जाता है।
तेरा सौन्दर्य देखकर चन्द्रमा तेरे घर के आँगन मे ही ठहर जाता है और आगे
नही बढता । दिन मे तो पवन चलता ही रहता है, पर रात मे भी वह दिन की
आशा से तेरे पीछे लगा रहता है, अर्थात् तेरी सुगध का लोभी पवन रात-दिन
तेरे इर्द-गिर्द चलता रहता है। इस पवन के रात-दिन चलते रहने के कारण
तेरा तो कुछ नही बिगडता, पर बेचारे पथिक का रास्ता रुक गया है; अर्थात्
पवन-वेग के कारण वह अपने माग पर नही चल पाता ।
२. प्रेम-व्यापार का वर्णन - जिस प्रकार रसखान ने रूप का पर्याप्त विस्तार
से वर्णन किया है, उसी प्रकार प्रेम-व्यापार का भी किया है । यह व्यापार
कुंजलीला, रासलीला, दानलीला और फागलीला मे विशेष रूप से मुखरित
हुआ है।
कोई गोपी कृष्ण से मिलकर आई है । अपनी मिलन-दशा का वर्णन वह
अपनी सखी से करती है कि हे सखि । मैं आज प्रात काल जब कुंजगली से
निकली तो अचानक कृष्ण से भेट हो गई । कृष्ण के मुख की मुस्कान मे मेरा
मन इतना अधिक डूब गया कि वह उस मुस्कान की छवि पर से नही हटता,
हटाने पर भी नही हटता । उस मुस्कान ने मेरे नैनो को बांध लिया, चित को
चुरा लिया और प्रेम का गहरा फंदा डाल दिया । तुम्ही बताओ, अब मैं क्या
करू ? मेरे चित्त मे बसा हुआ कृष्ण कैस बाहर निकाला जा सकता है । उस
आनन्द-सागर कृष्ण के सौन्दर्य ने तो मेरे सारे शरीर को ही घेर लिया है—
'कु जगली मै अली निकसी तहाँ साँवरे ढोटा कियौ भटनेरो ।
माई री वा मुख की मुसकान गयौ मन बूडि फिरै नहि फेरो ।
डोरि लियौ दृग चोरि लियौ चित डार्यौ है प्रेम को फंद घनेरो ।
कैसी करौ अब क्यौ निकस्यो रसखानि पर्यौ तन रूप को घेरो ।'
रासलीला मे प्रेम-व्यापारो का कु जलीलाओ की अपेक्षा अधिक वर्णन है ।
रासलीला के समय नटखट कृष्ण अपनी बाँसुरी मे जिस गोपी का नाम ले देते हैं
वह तो अपना सर्वस्य भूलकर कृष्ण के ऊपर न्यौछावर ही हो जाती है—
अधर लगाइ रस प्याइ बांसुरी बजाइ,
मेरो नाम गाइ हाइ जादू कियौ मन मैं ।
समीक्षा भाग ८७
नटखट नवल सुघर नन्दनन्दन ने,
करिकै अचेत चेत हरिकै जतन मैं ।
झटपट डलट पुलट पट परिधान,
जान लागी लालन पै सबै बाम वन मैं ।
रस रास सरस रंगीलो रसखानि प्रानि,
जानि जोर जुगुति बिलास कियौ जन पै' ।
कोई गोपी अपनी सखी से रासलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि जब
कृष्ण ने अपनी बाँसुरी बजाई और मेरा नाम उसमे गाया तो मेरे मन पर वह
जादू कर गया । नटखट, युवक और सुन्दर कृष्ण ने मुझे अचेत करके यत्नपूर्वक
अपने ध्यान मे लगा लिया, अर्थात् मेरी वह अवस्था कर दी कि मै उसके बिना
नही रह सकती थी । बासुरी की ध्वनि को सुनकर सारे ब्रज की स्त्रियाँ जल्दी
से अपने वस्त्रो को उलटा-सीधा पहनकर बन मे पहुँच गईं । तब सुन्दर रास
रचने वाले सरस और रंगीले कृष्ण ने वहाँ आकर रास-लीला की तथा युवतियों
का समूह एकत्र करके उनके साथ आनन्द मनाया ।
'आज भटू मुरली-बट के तट नन्द के साँवरे रास रच्यौ री ।
नैननि सैननि वैननि सो नंहि कोऊ मनोहर भाव पच्यौ री ।
जद्यपि राखने कौ कुल-कानि सबै ब्रज-बालन आन बच्यौ री ।
तद्यपि वा रसखानि के हाथ बिकानी को अंत लख्यौ पै लख्यौ री ॥'
अर्थात् जब कृष्ण ने मुरली-बट के नीचे रास रचा तो उन्होने प्रेम की सभी
भंगिमाओ का प्रदर्शन किया, कोई भी भाव उनसे बचा न रह सका । उनकी
भगिमाओ को देखकर ब्रज-बनिताएँ इतनी भाव-विभोर हुईं कि प्रयत्न करने
पर भी वे अपनी कुल-मर्यादा को न बचा सकी, अर्थात् कृष्ण के वशीभूत
हो ही गईं ।
फागलीला मे प्रेम-व्यापारो का रूप और भी अधिक स्पष्ट है । इसी लीला
का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कल
गोकुल का एक ग्वाला कृष्ण) चारो ओर की गोपियों को घेरकर, भाँवर रचा
कर, धूम मचा गया । वह बांकी बांसुरी की तान सुनाकर तथा हृदय को उल्ल-
सित करके सहज स्वभाव से सब गाँव वालो को ललचा गया है। वह अपनी
८८ रसखान-ग्रन्थावली
पिचकारी चलाकर तथा समस्त युवतियों को प्रेम से भिगोकर और अपनी आँखों
को नचाकर मेरे सारे अंगों को नचा गया है। वह हमारी ही गली में मेरी सासु
को तथा भोली ननद को नचाकर और पुराने बैरों को बदना लेकर मुझे लज्जित
कर गया—
'गोकुल को ग्वाल काल्हि चौमुँह की ग्वालिन सों,
चांचर रचाइ एक धूमहि मचाइगो ।
हियो हुलसाय रसखानि तान गाइ बांकी,
सहज सुभाउ सब गांव ललचाइगो ।
पिचका चलाइ और जुवती भिजाइ नेह,
लोचन नचाइ मेरे अंगहि नचाइगो ।
सासुहि नचाइ मोरी नंदहि नचाइ गोरी,
बैरनि सचाइ गोरी मोहि सकुचाइगो ॥'
कृष्ण पर फागलीला का इतना अधिक भूत सवार है कि वे रास्ते में आती-
जाती ग्वालिनों को भी नहीं छोड़ते। इतनी जबरदस्ती से उनके मुख पर गुलाल
मलते हैं कि उनकी साड़ियां भी फट जाती हैं, पर वे इसकी तनिक भी चिन्ता
नहीं करते। यहाँ तक कि मनचाही किये बिना वे किसी को नहीं छोड़ते। ऐसी
ही एक घटना का वर्णन कोई गोपी अपनी सखी से कर रही है—
'आवत लाल गुलाल लिये मग सूने मिली इक नार नवीनी ।
त्यां रसखानि लगाइ हियें भटू मोज कियो मन माहि अधीनी ।
सारी फटी सुकुमारी हटी अंगिया दरकी सरकी रंग भीनी ।
गाल गुलाल लगाइ लगाइ के अंक रिझाइ विदा करिदीनी ॥'
दानलीला में भी प्रेम के ये व्यापार पूर्णतया मुखरित हुए हैं। एक
उदाहरण देखिए—
'छीर जो चाहत चीर गहे एजू लेउ न केतिक छीर अचैहौ ।
दान के मिस माखन मांगत खाउ न माखन केतिक गैहौ ।
जानति हौं जिय की रसखानि सु काहे कौं एतिक बात बढ़ैहौ ।
गोरस के मिस जो रस चाहत सो रस कान्हजू नैकु न पैहौ ॥'
अत हम देखते हैं कि रसखान ने प्रेम-व्यापारो का पर्याप्त और सफल
समीक्षा भाग ८६
चित्रण किया है ।
३. नायिका-भेद—प्रेम-व्यापार में नायिका को प्रमुख स्थान दिया गया
है, अतः इसके भेदों के वर्णन का विधान भी सयोग शृंगार के अन्तर्गत किया
जाता है। रसखान आचार्य नही, कवि हैं। अतः यह आवश्यक नही कि सभी
काव्यशास्त्रीय विधान इनके काव्य मे उपलब्ध हो । जहाँ तक नायिका-भेद का
प्रश्न है, इस ओर से ये प्रायः उदासीन ही रहे हैं। इस उदासीनता का कारण
इनका भक्त-हृदय है। फिर भी कुछ नायिकाओ के भेद इनके काव्य मे स्वतः आ
ही गये हैं । यथा—
'बाँकी मरोर गही भृकुटीन लगी अँखियाँ तिरछानि तिया की ।
टाँक सी लाँक भई रसखानि सुदामिनि ते दुति दूनी हिया की ।
सोहैं तरंग अनंग की अगनि ओप उरोज उठी छतिया की ।
जोबन-जोति सु यौं दमकै उसकाइ दई मनोबाती दिया की ॥'
इसमे मुग्धा नायिका की वय संधि का वर्णन है। और—
'जो कबहूँ मग पाँय न देत सु तो हित लालन आपुन गौनै ।
मेरो कह्यो करि मौन तजो कहि मोहन सो बलि बोल सलौने ।
सौहैं दिवावत हौ रसखानि तूं सौहै करै किन लाखनि लौने ।
नोखी तूं मानिनि मान कह्यो किन आन बसंत मै कीनौ है कौनै ॥'
✕ ✕ ✕
'मान की आँधि है आधी घरी अरी जौ रसखानि डरै हित कें डर ।
कै हिन छोडिये परिये पाइनि ऐसे कटाछनही हियरा-हर ।
मोहनलाल को हाल विलोकिये नेकु कछु किनि छुवै कर सो कर ।
नाँ करिवे पर वारै है प्रान कहा करि हैं अब हाँ करिवे पर ॥'
इन सवैयो मे मानवती नायिका का वर्णन है ।
'खेलै अलीजान के गन मै उत प्रीतम प्यारे सो नेह नवीनो ।
बैननि बोध करै इन कौ, उत सैननि मोहन को मन लीनो ।
नैननि की चलित्री कछु जानि सखी रसखानि चितवै कौ कीनो ।
जा लखि पाइ जंभाइ गई चुटकी चटकाइ बिदा कर दीनो ॥'
यहाँ क्रियाविदग्धा नायिका है । यह नायिका अपने प्रेम-व्यापारो को
अपनी क्रियाओ के द्वारा छिपाने का प्रयास करती है ।
६० रसखान-ग्रन्थावली
'नाह-वियोग बढ़यौ रसखानि मलीन महा द्युति देह तिया की ।
पंकज सो मुख गो मुरझाय लगी लपटें बरि स्वाप हिया की ।
ऐसे मैं आवत कान्ह सुने हुलसै तरकी जु तनी अंगिया की ।
यो जग जोति उठी अंग की उसकाड दई मनी बाती दिया की ॥'
इसमे आगतपतिका है, क्योकि विरहिणी को उसके प्रियतम के आने का
समाचार मिल गया है ।
नायक और नायिका का सयोग कराने मे नायिका की सखियो का भी
महत्त्वपूर्ण योगदान होता है । वे उसे प्रेरित करके नायक के पास भेज ही देती
हैं । निम्नलिखित सवैये मे अपनी सखी को प्रेरित करती हुई एक गोपी कहती
है कि न जाने मिलन का ऐसा अवसर फिर मिले या न मिले, अत. तुम शीघ्र
ही कृष्ण से जाकर मिल तो—
'सोई है रास मैं नैसुक नाचि कै नाच नचायो कितौ नदनंद जिन ।
सोई है री रसखानि किते मनुहारिन सूधैं चितौत न दो छिन ।
तो मै धौं कौन मनोहर भाव बिलोकि भयौ बस हाहा करी तिन ।
औसर ऐसो मिलै न मिलै फिरि लंगर गोठौ कनौड़ौ करै बिन ॥'
संयोग-शृंगार के अन्तर्गत रसखान ने मिलन का वर्णन भी दिया है और
सुरत का भी । मिलन का वर्णन इस सवैये मे निहित है—
'एक समै इक ग्वालिन को ब्रजजीवन खेलत दृष्टि पर्यो है ।
बाल प्रवीन सकै करिकै सरकाइ कै मोरन चीर धर्यो है ।
यां रस ही रस ही रसखानि सखी अपनो मनभायो कर्यो है ।
नन्द के लाडिले ढाँकि दै सीस हहा हमरो बरु हाय भर्यौ है ॥'
रसखान ने सुरत और सुरतान्त का भी वर्णन किया है । यथा—
'बह सोई हुती परजंक लली लला लीनो सु आइ भुजा भरिकै ।
अकुलाइ कै चौकि उठी सु डरी निकरी चहै अंकनि तें फरिकै ।
झटका झटकी मैं फटी पहुचा टरकी अंगिया मुकना फरिकै ।
मुख बोल कठे रिस मे रसखानि हटो जू लला निबिया धरिकै ॥'
इस सवैये मे सुरत का वर्णन है । नायिका पलंग पर सोई हुई थी कि अचा-
नक कृष्ण वहाँ पहुँच गए और उसे अपनी बाहुओ के पाश मे बाँध लिया । वह
समीक्षा भाग ६१
आकुल होकर और भयभीत होकर जग गई। उसने काफी जोर लगाया कि वह
स्वय को उस आलिंगन से मुक्त कर ले, पर उस सघर्ष मे उसकी चोली और
फट गई। तब उसने रोष मे भरकर कृष्ण की भर्त्सना करनी शुरू कर दी।
सुरत का यह वर्णन बहुत ही स्वाभाविक है। और—
'सोई हुती पिय की छतियां लगि बाल प्रवीन महा मुद मानै।
केस खुले छहरै बहरै फहरै छबि देखत मैन भ्रमानै।
वा रस मैं रसखानि पगी रति रैन जगी अँखियाँ अनुमानै।
चन्द पै बिम्ब और विम्व पै कैरव कैरव पै मुकतान प्रमानै।।'
इन विवेचन के आधार पर हम कह सकते है कि रसखान का संयोग-वर्णन
पूर्ण और सफल है। रूप-प्रभाव से लेकर सुरतान्त तक के चित्रण इनके काव्य
म मिलते है।
वियोग-वर्णन
जब किसी कारण से नायक और नायिका एक-दूसरे से दूर हो जाते है तो
इम दशा को वियोग की दशा कहते है और यह दशा वियोग या विप्रलम्भ
श्रृंगार के अन्तर्गत आती है। प्राय सभी कवियो ने संयोग श्रृंगार की अपेक्षा
वियोग-श्रृंगार को अधिक महत्त्व दिया है। इसका कारण यह है कि सयोग की
अपेक्षा वियोग में पुन स्थितियाँ अधिक व्यापक और भावुक बन जाती है।
जिस प्रकार अग्नि मे तपाने पर रग मे उज्ज्वलता और परिपक्वता आती है,
उसी प्रकार वियोगाग्नि मे जलकर मन के सात्विक भाव शुद्ध, परिष्कृत और
परिपक्व बन जाते है।
वियोग-श्रृंगार के चार भेद माने गये हैं—
१. पूर्वराग
२. मान
३. करुण
४. प्रवास
पूर्णराग मे प्रिय के गुण-कथन अथवा श्रवणमात्र से ही उससे मिलने की
इच्छा उत्कट हो जाती है और उसका अभाव खटकने लगता है। मान मे नायिका
का रूठना आता है। कुछ आचार्य मान विप्रलंभ को अधिक महत्त्व नही देते।
६२ रसखान-ग्रन्थावली
इसका कारण यह है कि मान की स्थिति मे वस्तुत वियोग होता ही नही है,
क्योकि रूठने पर भी नायक और नायिका साथ-साथ तो रहते ही है और एक
दूसरे के दर्शन करते रहते है, अत यह स्थिति न तो करुण है और न प्रभाव
शाली। प्रवास विप्रलम्भ तब होता है जब किसी कारण से नायक विदेश चला
जाता है। किसी शाप या प्रेम-पात्र की मृत्यु के कारण जो विरह-भावना होती
है, वह करुण विप्रलम्भ के अन्तर्गत आती है। इस स्थिति को भी आचार्य
अधिक महत्त्व नही देते, क्योकि मृत्यु के उपरान्त तो सारा खेल ही समाप्त हो
जाता है और तब सन्तोष तथा धैर्य की भावना का प्राधान्य हो जाता है। ये
भावनाएँ कारुणिक भावो को जागृत करने मे बाधक है।
रसखान-काव्य मे वियोग की पृथक तीन स्थितियां ही मिलती है। यथा—
पूर्वराग —
१ 'लोक की लाज तज्यो तबही जब देख्यो सखी व्रजचन्द सलोनो।
खंजन मीन सरोजन की छवि गंजन नैन लगा दिन होनो।
हेरे सम्हारि सकै रसखानि सो कौन तिया वह रूप सुठोनो।
भौह कमान सो जोहन को सर वेधत प्राननि नन्द को छोनो॥'
२. 'उनही के सनेहन सानी रहें उनही के जु नेह दिवानी रहें।
उनही की सुनै न श्रौ बैन त्यौ सैन सो चैन अनेकन ठानी रहें।
उनही सग डोलन मैं रसखानि सर्वै सुख सिन्धु अघानी रहै।
उनही बिन ज्यो जलहीन ह्वै मीन सी आँखि मेरी अँसुवानी रहै॥'
मान—
'प्रिय सों तुम मान कर्यौ कत नागरि आजु कहा विनहूँ सिख दीनी।
ऐसे मनोहर प्रीतम के तरुनी वरुनी पग पोछै नवीनी।
सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख नैननि चैन महारस भीनी।
रसखानि न लागत तोहि कछू अब तेरी तिया किनहूँ मति छीनी॥'
प्रवास —
उपर्युक्त दोनो स्थितियो की अपेक्षा रसखान ने प्रवास-विप्रलंभ का अधिक
वर्णन किया है प्रियतम के विदेश चले जाने पर बीती बातें एक एक करके
विरहिणी के मस्तिष्क मे आती रहती हैं और उसे व्यथित करती रहती हैं,
[Header] समीक्षा भाग ६३.
उसकी व्यथा को बढ़ाती रहती हैं। जब भी प्रिय की बाते चलती हैं, विरहिणी
को बीती घटनाएँ स्मरण हो आती है—
'प्रेम कथानि की बात चलै चमकै चित चंचलता चिनगारी ।
लोचन बक विलोकनि लोलनि बोलनि मे बतियाँ रसकारी ।
सोहै तरंग अनग की अंगनि कोमल यौ झमकै झमकारी ।
पूतरी खेलत ही पटकी रसखानि सु चौपर खेलत प्यारी ॥'
लेकिन अब चौपड़ खेलने का अवसर कहाँ ? उसका प्रिय तो विदेश मे बैठा
हुआ है। केवल स्वप्न मे ही उससे मिलन हो सकता है—
'काह कहूँ रतियाँ की कथा बतियाँ कहि आवत है न कछू री ।
आइ गोपाल लियो परि अंक कियौ मनभायो पियौ रस कूँ री ।
ताही दिना सो गडी अखियाँ रसखानि मेरे अंग-अंग मे पूरी ।
पै न दिखाई परै अब बावरी दै कै वियोग बिथा की मजूरी ॥'
'वियोग बिथा की मजूरी, देने वाला प्रियतम अपनी क्रूरता का संबल
लेकर नायिका को सदैव तड़पाता रहता है, उसे अहर्निश व्यथित करता रहता
है। नायिका का भोलापन केवल इतना था कि वह उसकी मुस्कान पर, उसकी
बाँसुरी की तान पर और उसके मंजूल मुख पर स्वय को न्यौछावर कर बैठी।
इससे वियोग-व्यथा भी मिली और समाज मे बदनामी भी हुई —
'वा मुसकान पै प्रान दियो जिय जान दियो वहि तान पै प्यारी ।
मान दियो मन मानिक के संग वा मुख मजु पै जोबन हारी ।
वा तन कौ रसखानि पै री तन ताहि दियो नहिं आन बिचारी ।
सो मुँह मोरि करी अब का कह। लाल लै आज समाज मे ख्वारी ।"
कृष्ण के बिना विरहिणी ने खाना और पहनना सब कुछ छोड़ दिया है—
'मोहन सो अटक्यो मनु री कल जाते परै सोई क्यौ न बतावै ।
ब्याकुलता निरखे बिन मूरति भागति भूख न भूषन भावै ।
देखे ते नेकु सम्हार रहै न तबै झुकि कै लखि लोग लजावै ।
चैन नही रसखानि दुहूँ बिधि भूली सबै न कछु र्बान आवै ॥'
वियोग-शृंगार के अन्तर्गत प्रकृति का उद्दीपन रूप मे वर्णन करने की
काव्यशास्त्रीय परम्परा है । रसखान ने इस परम्परा का भी पालन किया है।
यथा—
२. सुजान रसखान: गोपी-प्रेम, रास व बाललीला सवैया
९४ रसखान-ग्रन्थावली
'फूलत फूल सबै बन बागन बोलत भोर बसंत के आवत।
कोयल की किलकार सुने सब कत बिदेसन तें सब धावत।
ऐसे कठोर महा रसखानि जु नेकहु मोरी ये पीर न पावत।
हूक सी सालत है हिय मैं जब बैरिन कोयल कूक सुनावत॥'
प्रिय का पथ देखते-देखते विरहिणी की आँखें धुँधली पड़ गई हैं। जीभ
उसके गुणों को रटते-रटते थक गई है, लेकिन अभी तक प्रिय के आने का कोई
सन्देश ही नही मिलता है—
'मग हेरत धूंधरे नैन भये रसना रट वा गुन गावन की।
अंगुरी गनि हार थकी सजनी सगुनोती चलै नहि पायन की।
पथिको कोउ ऐसो जु नाहि कहै सुधि है रसखान के आवन की।
मनभावन आवन सावन मैं कही औधि रही दृग बायन की॥'
इस प्रकार हम देखते हैं कि रसखान के वियोग-वर्णन में स्वाभाविकता और
प्रभावोत्पादकता है। लेकिन सर्वत्र ऐसा नही हुआ है। कहीं-कहीं रसखान पर
रीतिकालीन जादू सर पर चढ़कर बोल उठा है। ऐसे स्थलों पर उनका वर्णन
ऊहात्मक बन गया है। यथा —
'विरहा की जु आंच लगी तन में तब जाय परी जमुना जल मे।
विरहानल तें जल सूखि गयो मछरी बहि छांटि गई तल मे।
जब रेत फटी रु पतार गई तब सेस जरयो धरती तल मे।
रसखान तबै ओह आंच मिटी जब आय के स्याम लगे गल मे॥'
× × × ×
'गोकुलनाथ वियोग प्रलै जिमि गोपिन नद जसोमति जू पर।
बढ़ि गयो अँसुवान प्रवाह भयो जल मे ब्रजलांक तिहू पर।
तीरथराज सी राधिका प्रान सु तो रसखान मनौ ब्रज भू पर।
पूरन ब्रह्म ह्वै ध्यान रह्यो पिय औधि असैवट पात के ऊपर॥'
लेकिन ऐसे स्थल कम ही हैं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि रसखान ने अपने काव्य मे केवल
एक रस की—श्रृंगार रस की—योजना की है और इसमे ये भावुकता एवं
स्वाभाविकता की दृष्टि से भी और परम्परा के पालन की दृष्टि से भी पूर्णतया
सफल सिद्ध हुए हैं।
: ७ :
रसखान के कृष्ण
भारतीय साहित्य मे कृष्ण के स्वरूप का उल्लेख अत्यन्त प्राचीन काल से
होता चला आ रहा है। वैदिक साहित्य मे कृष्ण का जिस रूप मे उल्लेख हुआ
है, उससे उमे न तो अवतार की संज्ञा दी जा सकती है और न देवता की ही।
महाभारत मे कृष्ण के अवतारी रूप का अवश्य उल्लेख मिलता है पर इस रूप
के वर्णन की सीमा कम ही है, अर्थात् इस रूप मे इनका वर्णन थोडा ही हुआ
है। महाभारत के अनन्तर कृष्ण की गणना पूर्ण अवतारो मे होने लगती है।
गोपाल-रूप मे उनकी उपासना की पद्धति प्रचलित करना पुराणकाल की ही
देन है। हरिवंश-पुराण मे कृष्ण के स्वरूप का सबसे अधिक विस्तार और वर्णन
पाया जाता है। इस पुराण मे कृष्ण के चरित को गोपियो से आबद्ध किया
गया है। 'विष्णु-पर्व' के १२८ अध्यायो मे कृष्ण की जीवन-गाथा वर्णित है
जिसमे कृष्ण के चरित के अनेक पहलुओ पर प्रकाश डाला गया है। यथा –
'पूतनावध, शकटवध, ममलार्जुन-पतन, माखन-चोरी, कालिय-मर्दन, धेनुक वध
प्रलम्ब-वध, गोवर्धन-धारण इत्यादि। कृष्ण की इन लीलाओ का वर्णन करते
समय पुराणकार ने यथास्थल प्रकृति के भी मनोरम चित्रण प्रस्तुत किये हैं।
इसके अतिरिक्त पद्म पुराण, वायुपुराण, वामनपुराण, सूर्य पुराण, गरुड-पुराण
और विष्णुपुराण, मे भी कृष्ण से सम्बद्ध अनेक गाथाओ का वर्णन किया गया
है। पद्मपुराण मे अध्याय ६६ से ७२ तक श्री कृष्ण के महात्म्य का वर्णन है
और अध्याय ७२ से ८३ तक वृन्दावन आदि के महत्त्व का तथा कृष्ण की
लीलाओ का विवेचन किया गया है। इसी पुराण मे गोपियो के अध्यात्मपक्ष
और उनकी उत्पत्ति के विषय मे भी विस्तार से उल्लेख किया गया है। द्वारिका,
गोकुल, मथुरा, वृन्दावन आदि का भी सुन्दर वर्णन है तथा द्वादश वनो का भी
उल्लेख है। इस अध्याय के श्लोक ८८ से १०२ तक कृष्ण के सौन्दर्य का
अत्यन्त मनोरम चित्रण किया गया है। कृष्ण भक्त साहित्य पर इस पुराण
का काफी प्रभाव है। पुष्टिमार्गीय आचार्यो ने इसमे से अनेक बातो को तो
ज्यो का त्यो ही अपना लिया है। वायुपुराण मे स्यमन्तक मणि की कथा का
विस्तार पूर्वक वर्णन करके फिर कृष्ण जन्म का वर्णन किया गया है। इसके
६६ रसखान-ग्रन्थावली
पश्चात् कृष्ण की सोलह सहस्र रानियो तथा उनके पुत्रो आदि का वर्णन है ।
वामनपुराण मे कृष्ण जीवन से सम्बद्ध केवल केशी, मुर और कालनेमि के वध
की कथाओ का वर्णन है । कूर्मपुराण मे यदुवश वर्णन के अन्तर्गत कृष्ण के पुत्रो
की कथा वर्णित है गरुणपुराण के १४८ वे अध्याय मे कृष्ण की लीलाओ
का विस्तार पूर्वक वर्णन है । इस पुराण मे कृष्ण-विषयक कथाएँ ये हैं—
पूतना-वध, यमलार्जुनोद्धार, गोवर्धन-धारण, केशी-चाणूर-वध, कालिय मर्दन,
शकटासुर-वध, कृष्ण की रुक्मिणी सत्यभामा आदि आठ रानियो का उल्लेख
और सदीपन गुरु के पास विद्याध्ययन । विष्णुपुराण मे चौथे अंश के पन्द्रहवे
अध्याय मे श्रीकृष्ण के जन्म का वर्णन है। पाँचवे अंश मे कृष्ण-चरित का विशेष
रूप से अंकन हुआ है। इसमे कृष्ण की लीलाओ के साथ-साथ रासलीला का
भी वर्णन है ।
कृष्ण-चरित से सम्बद्ध भागवतपुराण सब पुराणो से अधिक महत्वपूर्ण है ।
कृष्णभक्तो ने अपने मार्ग में इसी को आधार के रूप मे ग्रहण किया है । महा-
भारत से लेकर पुराणकाल तक जितना भी कृष्ण का विवेचन हुआ है, वह सब
इस पुराण मे संग्रहीत है यद्यपि इस पुराण मे कृष्ण के सभी रूप आ गये हैं, पर
प्रमुखता रसिकराज कृष्ण की ही है । डा० हरवमलाल शर्मा ने बाल-लीलाओ
को छोडकर कृष्ण के शेष जीवन चरित की दृष्टि से भगवत के प्रतिपाद्य को
घटनात्मक, उपदेशात्मक, स्तुत्यात्मक और गीतात्मक इन चार भागो मे विभा-
जित किया है और इनका विवेचन निम्नलिखित शब्दो मे किया है —
१. घटनात्मक—श्रीमदभागवत के वे स्थल घटना-प्रधान स्थल हैं जो ऐति-
हासिक घटनाओ का वर्णन करते हैं । परन्तु जैसे गोस्वामी तुलसीदास जी
मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के चरित्र को चित्रित करते हुए 'रामचरित-
मानस मे ग्रन्थ के प्रधान सूत्र भक्ति को नही छोडते और उसी भावना से अभि-
भूत होकर अनजाने ही राम के चरित मे अलौकिकता का रूपादेश कर जाते हैं,
उसी प्रकार व्यास जी का लक्ष्य भी भगवत भक्त-निरूपण द्वारा भक्तिरस का
परिपाक करना है । अतएव भागवतकार ने घटनात्मक स्थलो पर भी भगवान के
दिव्य मंगल-स्वरूप की कई बार स्तुति कराई है । जैसे—भोमासुर-वध के
समय, वाणासुर-सग्राम के समय तथा वेद-स्तुति आदि । इन घटनाओ मे अलौ-
किक घटनाओ का भी सम्मिश्रण है। जैसे स्वर्ग से कल्पवृक्ष लाना, देवकी
के मृतक पुत्रो को लाना आदि । ऐसे स्थलो पर कवि की प्रतिभा सजग
हो उठती है और वह भगवान के स्वरूप मे इतना तन्मय हो जाता है कि
अन्य सब भाव अभिभूत हो जाते हैं तथा हृद्यानुभूति रागात्मिका वृत्ति के
साथ उन स्तुतियो और स्तोत्रो के रूप मे साक्षात् रूप धारण कर लेती है ।
श्रीमद्भागवत मे जहाँ-जहाँ भी इन घटनाओ का उल्लेख है, वही वही कवि
की इस अनुभूति का परिचय मिलता है । इस घटनात्मक भाग मे
समीक्षा भाग ६७
भागवतकार का उद्देश्य भी भक्ति की दृढ़ता ही है ।
२ उपदेशात्मक—भागवत के उपदेशात्मक भाग मे हमे श्रीकृष्ण
योगेश्वर, उपदेष्टा तथा विज्ञानी के रूप मे मिलते है। श्रीमद्भागवत मे दो
प्रकार के उपदेश है—साधारण तथा विशेष । साधारण उपदेश वे उपदेश है
जो साधु, महात्माओ, गुरुजनो या मित्रो ने दिए है। इन उपदेशो का अभिप्राय
कर्त्तव्यकर्म का अनुष्ठान करते हुए भगवद्भक्ति करना है। विशेष उपदेशो के
रूप मे वे स्थल आते है, जहाँ उपदेश किसी व्यक्ति विशेष को विशेष रूप से
दिये गए हैं। जैसे उद्धव के प्रति भगवान् के उपदेश, ध्रुव को नारद का उपदेश,
चतु श्लोकी भागवत तथा कपिलगीता आदि । ये उपदेश बड़े महत्वपूर्ण है
क्योकि इनसे दो बातो की व्याख्या हुई है—परमतत्व की और ज्ञान-भक्ति
कर्म की ।
३. स्तुत्यात्मक—भागवत का स्तुत्यात्मक भाग भी बडा महत्त्वपूर्ण है
क्योकि इसके द्वारा भी कृष्ण के वास्तविक रूप की व्याख्या की गई है । ये
स्तुतियाँ दो प्रकार की है—सकाम और निष्काम । सकाम स्तुतियाँ वे है जो
किसी कामना से प्रेरित होकर की गई है। जैसे—कारागार से मुक्त होने के
लिए, किसी आपत्ति या दैहिक, दैविक, भौतिक तापो की निवृत्ति के लिए की
गई है। निष्काम स्तुतियाँ दो प्रकार की होती है—एक तो वे जिनमे तत्त्व-
ज्ञान की प्रधानता है और दूसरी वे जिनमे साधन की प्रधानता है। वेद-स्तुति
तत्वज्ञान-प्रधान स्तुति कही जायेगी, क्योकि इसमे सब तत्वो का पर्यवसान एक
ही तत्त्व मे दिखाया गया है। प्रह्लाद अम्बरीष, ब्रह्मा, ध्रुव आदि की स्तुतिया
साधन-प्रधान कही जायेगी क्योकि इनमे भक्त मुक्ति का इच्छुक न होकर
केवल भगवान के रूप तथा लीला के स्मरण, कीर्तन मे आनन्द लेता है।
४ गीतात्मक—श्रीमद्भागवत का चौथा भाग गीतात्मक है। इन गीतों
मे ग्रन्थकार का हृदय साक्षात् रूप से द्रवित होता हुआ प्रतीत होता है। उसकी
अन्तरात्मा इन गीतो मे पूर्णरूपेण प्रस्फुटित है। ये हृदय के वे स्वत प्रवाही
स्रोत हैं जिनका अवरोध कवि के वश की बात नही थी । उसकी आत्मा की
व्यथा एव अन्तर्वेदना के ये गीत साकार प्रतिबिम्ब है। प्रेम और विरह की
भावनाओ से ओतप्रोत इन गीतो की सख्या अधिक नही है। पाँच गीत गोपियो
के तथा एक द्वारिका की कृष्ण-पत्नियो का है । ये छ गीत दशम स्कन्द मे
६८ रसखान-ग्रन्थावली
आए हैं। एकादश स्कन्ध मे भी दो गीत आये है—एक पिंगला का और दूसरा
एक भिक्षुक ब्राह्मण का। पिंगला का गीत निर्वेद-गीत है जो ससार के कटु
अनुभवो से उत्पन्न अन्तर्वेदना का अभिव्यजन करता है। सात्विक और
सदाचारी होने पर भी दुनिया के हाथो अपमानित होने वाले ब्राह्मण भिक्षुक
के गीत मे भी वेदना की झलक है। कृष्ण की पत्नियो का गीत दशम स्कन्द
के ६०वे अध्याय मे है। उनका मन भगवान की लीला मे इतना तन्मय हो
जाता है कि वे अपने को भूल जाती है। सासारिक अनुभवो का ज्ञान लुप्त ह
जाता है और आत्म-विभोरता की अनिर्वचनीय दशा मे उनके हृदय-ह्रद से
अनायास ही भावधारा वह निकलती है। समस्त प्रकृति उन्हे कृष्णमयी लगतो
है और वे प्रकृति के सब पदार्थों को सम्बोधित करके उनका कृष्ण से सम्बन्ध
स्थापित करती है। वे यह भी भूल जाती है कि कृष्ण उनके समीप हैं।
गोपी गीतो का वर्णन तो वर्णनातीत है। उनके पांचो गीतो मे अनुपम प्रेम की
झलक है। प्रतीत होता है हृदय वाणी के साथ लिपटा हुआ चला आया है।
उपर्युक्त विवेचन से निम्नलिखित निष्कर्ष निकलते हैं—
१ कृष्ण के दो रूप है—सगुण कृष्ण और निर्गुण कृष्ण।
२ कृष्ण का सौन्दर्य अमित है।
३ कृष्ण और गोपियो मे घनिष्ठ प्रेम-सम्बन्ध है।
४ कृष्ण अनेक प्रकार की लीलाएँ करते हैं।
रसखान ने भी कृष्ण के स्वरूप मे इन्ही विशेषताओ को प्रतिष्ठित
किया है।
सगुण कृष्ण
सिद्धान्तत कृष्णभक्त-कवि कृष्ण का निर्गुण रूप ही स्वीकार करते हैं,
पर व्यवहारत उन्हे कृष्ण का सगुण और साकार रूप ही मान्य है। इसका
कारण यह हे कि भक्ति के लिए किसी साकार आलम्बन की आवश्यकता होती
है, क्योकि निराकार आराध्य पर मन की एकाग्रता प्रतिष्ठित नही हो सकती।
सूरदास के शब्दो मे—
'रूप रेख गुन जाति जुगति बिनु निरालम्ब मन चकृत धावै।
सब विधि अगम विचारहि ताते सूर सगुन लीला पद गावै ॥'
इस सगुण कृष्ण मे कृष्णभक्तो ने अनेक प्रकार की विशेषताओ का
समावेश किया है। ये विशेषताएँ ही कृष्ण की विविध लीलामो के नाम से