रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
२७८ रसखान-ग्रन्थावली
इसी गाँव की रहने वाली थी। रंग विसतार = आनंद का प्रसार। निसान =
नगाडा ।
अर्थ - राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से
कहती है कि हे सखी ! आज वर्षा ऋतु मे बरसाने गाँव के सभी निवासी प्रसन्न
हैं, क्यो आज प्यारी राधा की वर्षगाँठ है, इसीलिए चारो ओर शोभा छाई
हुई है। हर स्थान पर अपार आश्चर्य और आनन्द का प्रसार है जिसे देखकर
लोग अपनी सुधि-बुधि भूल जाते है। दही वा दान लेने वाले कृष्ण राधा के
साथ यहाँ आये है। वे अत्यन्त प्रसन्न है, क्योकि उन्हे रूप-राशि राधा को
लूटने का अवसर मिला है। गाँव मे हर स्थान पर गुणी व्यक्ति गीत गाते
हुए सम्मानपूर्वक धन का दान कर रहे है और सर्वत्र मनोहर नागडे बज रहे है
विशेष—यह कवित्त श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान
ग्रन्थावली मे नही है ।
कवित्त
कैधो रसखान रस कोस दृग प्यास जानि,
आनि कै पियूप पूप कीनो विधि चद घर
कैधो मनि मानिक बैठारिवै को कंचन मैं,
जरिया जोवन जिन गढिया सुघर घर ।
कैधो काम कामना के राजत अधर चिन्ह,
कैधों यह भौर जान वोहित गुमान हर ।
एरी मेरी प्यारी दुति कोटि रति रम्भा की,
वारि डारो तेही चित चोरनि चिबुक पर ॥१६५॥
शब्दार्थ—रस कोस—आनन्द-निधि । पियूप पूप = अमृत का सार ।
विधि = ब्रह्म। गढिया सुघर घर = सुन्दर घर बना लिया। वोहित = नौका ।
गुमान हर = गर्व को नष्ट करने वाला। दुति = शोभा ।
अर्थ—कोई गोपी राधा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है
कि ब्रह्मा ने ससार को प्यासा जानकर उसकी तृप्ति के लिए तुम्हारे नेत्रो मे
आनन्द-निधि भर दिया है। तुम्हारा मुख इतना सुन्दर है जैसे अपने अमृत-सार
को सजोकर स्वय चन्द्रमा उपस्थित हो गया हो । तुम्हारे शरीर का गठन ऐसा
है जैसे सोने मे मणि-मुक्ताओ को जडने के लिए कुशल जडिया यौवन ने
व्याख्या भाग २७६
सुन्दर घर (रत्न जड़ने के लिए) स्थान बना दिया हो । तुम्हारे अधरो की लाली
काम कामना जैसी सुशोभित है । तुम्हारी नासिका का छिद्र उस भौंरे
के समान है जिसमे ज्ञान की नौका का गर्व नष्ट हो जाता है, अर्थात् सुधि-बुधि
नष्ट हो जाती है । मेरी प्यारी सखी राधा ! तेरी मनोहर चिबुक पर मै
करोडो रति और रम्भा की शोभा को न्यौछावर करती हूँ।
विशेष —यह कवित्त श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान
ग्रन्थावली' मे नही है।
सवैया
श्री मुख यौ न बखान सकै वृषभान सुता जू को रूप उजारो ।
हे रसखान तू ज्ञान सभार तरैनि निहार जु रीझन हारो ।
चारु सिंदूर को लाल रसाल लसै ब्रज बाल को भाल टिकारो ।
गोद मे मानौ विराजत है घनस्याम के सारे को सारे को सारो ॥१६६॥
शब्दार्थ—श्रीमुख=मुख की शोभा । वृषभान सुता=राधा । तरैनि=
नक्षत्र । रसाल=सरस । टिकारो=टीका । घनस्याम के सारे की सारे को
सारो=मगल ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! राधा के मुख की शोभा का कौन वर्णन कर सकता
है। उसका सौन्दर्य प्रकाशित करने वाला है। रसखान कहते है कि हे मनुष्य !
तू अपना ज्ञान सभाल और यदि तू राधा के रूप का कुछ बोध करना चाहता
है तो नक्षत्रो की ओर देख, अर्थात् जिस प्रकार नक्षत्रों की प्रभा अनुपम है,
उसी प्रकार राधा का रूप भी अद्वितीय है । उस ब्रजबाला के मस्तक पर लगा
हुआ सिन्दूर का टीका अत्यन्त सुन्दर एवं सरस है । वह टीका ऐसा प्रतीत
होता है मानो चन्द्रमा की गोद मे मंगल सुशोभित हो ।
विशेष—१. उत्प्रेक्षा अलकार ।
२ 'घनस्याम के सारे की सारे को सारो' मे क्लिष्टत्व दोष है
क्योकि इसका अर्थ क्लिष्टता से निकलता है—घनस्याम का साला=
चन्द्रमा; चन्द्रमा की स्त्री=बीरबहूटी; बीरबहूटी का भाई मगल ।
३ यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित
'रसखान-ग्रंथावली' मे नही है ।
२८० रसखान-ग्रन्थावली
सवैया
अति लाल गुलाल दुकूल ते फूल अली । अलि कुंतल राजत है।
मखतूल समान के गुज छरानि मैं किसुक की छवि छाजत है ॥
मुकता के कदव ते अव के मौर सुने सुर कोकिल लाजत है।
यह आवनि प्यारी जु की रसखानि वसत-सी आज विराजत है ॥१६७॥
शब्दार्थ-अली=सखी । अलि=भ्रमर । कुंतल=केश । मखतूल=
काला रेशम । छरानि मैं=डोरियो मे ।
अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! उसका अत्यन्त लाल गुलाल के समान दुकूल गुलाब
के लाल फूल की भाँति शोभायमान है । उसकी काली केशराशि भोरो के
समान सुशोभित है । काले रेशम की डोरियो मे बँधे हुए गुज पलाश-पुष्प की
भाँति शोभा सम्पन्न है । उसके मोती कदव और आम की मजरियो के समान
शोभायमान है । उसकी वाणी मे इतना माधुर्य है कि उसके वचनों को सुनकर
कोयल भी लजा जानी है । इस अपनी प्यारी और आनन्द की खान राधा की
शोभा वसन्त श्री के समान प्रतीत हो रही है ।
विशेष-यमक, उपमा, छेकानुप्रास और साग रूपक अलंकार ।
सवैया
तन चन्दन खौर कै बैठी भटू रही आजु सुधा की सुता मनसी ।
मनौ इन्दुवधून लजावन को सब जानिन काढि घरी गन सी ॥
रसखानि विराजति चौकी कुचौ बिच उत्तमताहि जरी तन सी ।
दमकै दृग वान के घायन को गिरि सेत के संधि के जीवन सी ॥१६८॥
शब्दार्थ-सुधा की सुता मनसी=सुधा की मानस-पुत्री । इदुववून=
चन्द्रमा की पत्नियो तारिकाओ को । लजावन=लज्जित करने के लिए ।
गन सी=गणश्री, अपने समूह की सात्विक छटा । चौकी=हार के बीच का
चदा । उत्तमताहि=सौन्दर्य को । संधि=बीच । जीवन-सी=जलाशय की
भाँति ।
अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से राधा की सुन्दरता का वर्णन करती
हुई कहती है कि हे सखि ! अपने शरीर पर चन्दन लगाकर बैठी हुई वह
सुधा की मानस पुत्री राधा ऐसी प्रतीत हो रही है, मानो चन्द्रमा की पत्नियों
व्याख्या भाग . २८१
तारिकाओं को लज्जित करने के लिए सब प्रकार से अपनी समग्र सात्विक
शोभा को बाहर निकाल कर बैठी हुई हो। रसखान कवि कहते हैं कि उसके
कुचों के बीच में हार का चंदा इस प्रकार शोभा दे रहा है, जैसे सौन्दर्य को
ही उसके शरीर मे जड दिया गया हो। वह चन्दा ऐसा प्रतीत होता है मानो
दृग बाणो का घाव दमक रहा हो, अथवा श्वेत पर्वत के संधिस्थान में कोई
जलाशय हो।
विशेष-१. उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और अतिशयोक्ति अर्थालंकारो का
बडा ही भावपूर्ण प्रयोग हुआ है।
२ 'दमकै दृग बान के घायन को' मे दी गई उपमा रसानुभूति
मे बाधक है।
सवैया
आज सँवारति नेकु भटू तन, मद करी रति की दुति लाजै ।
देखत रीझि रहे रसखानि सु और छटा विधिना उपराजै ॥
आए है न्यौते तरैमन के मनो सग पतंग पतग जु राजै ।
ऐसे लसै मुकुतागन मै तित तेरे तरौना के तीर बिराजै ॥१६६॥
शब्दार्थ-भटू = सखी। रति = कामदेव की स्त्री, जो सर्वाधिक सुन्दर
मानी जाती है। दुति = द्युति, शोभा। लाजै = लज्जित हो जाती है। रसखानि
= आनन्द सागर कृष्ण। विधिना = ब्रह्मा। उपराजै = उत्पन्न करे। तरैमन
के = नक्षत्रो के, मोतियो के। पतग = सूर्य, तरौना। पतग = शलभ, तिल।
तीर = किनारा।
अर्थ- कोई गोपी राधा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है
कि हे सखि ! आज तनिक अपना शरीर संभाल लो, क्योकि इसके सौन्दर्य के
समक्ष रति का सौन्दर्य भी मन्द हो गया है और वह इसी कारण लज्जित हो
रही है। आनन्द सागर कृष्ण तुम्हारी शोभा को देखकर रीझ रहे है। तुम्हारे
अतिरिक्त ब्रह्मा और क्या उत्पन्न करे ? अर्थात् तुम उसकी सौन्दर्य सृष्टि की
चरम पराकाष्ठा हो। मोतियो से युक्त तुम्हारे तरौना के किनारे पर सुशोभित
होता हुआ तिल इस प्रकार सुशोभित हो रहा है मानो सूर्य के साथ सारे नक्षत्र
आकर एकत्र हो गए हो।
विशेष-प्रतीप, श्लेप, यमक, उपमा अलंकार।
२८२ रसखान-ग्रन्थावली
सवैया
प्यारी की चारु सिंगार तरगनि जाय लगि रति की दुति कूलनि ।
जोवन जेब कहा कहियै उर पै छवि मजु अनेक दुकूलनि ।
कंचुकी सेत मै जावक विन्दु विलोकि मरै मघवानि की सूलनि ।
पूजे है आजु मनौ रसखान सु भूत के भूप वधूक के फूलनि ॥२००॥
शब्दार्थ - सिगार तरगन=सौन्दर्य की लहरे । जेब=कान्ति । सेत=
श्वेत, सफेद । जावक=महावर, लाल रग । मघवानि की सूलनि=इन्द्र वज्र
की चोट । भूत के भूप=शिव । वधूक के फूलनि=दुपहरिया के लाल रग के
फूलो से ।
अर्थ-कोई गोपी राधा के सौन्दर्य का वर्णन अपनी सखी से करती हुई
कहती है कि हे मखि ! उस प्यारी राधा के सुन्दर सौन्दर्य की लहरे रति की
शोभा के किनारो से जा लगी है, अर्थात् वह रति के समान सुन्दर है । उसके
यौवन की काति का तो कहना ही क्या ? उसके हृदय पर अनेक सुन्दर वस्त्रों
की शोभा सुशोभित है । उसकी श्वेत कचुकी मे लाल रग के विन्दु को देखकर
तो मनुष्य इन्द्र के वज्र की चोट की भाँति भारी चोट खाकर मर जाता है ।
उसके कुचो पर पडा हुआ लाल वस्त्र इस प्रकार प्रतीत हो रहा है। मानो
बन्धूक के फूलो से शिव की पूजा की गई हो ।
विशेष-१ उत्प्रेक्षा अलकार ।
२. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित
'रसखान ग्रथावली' मे नही है ।
तुलना—'दुरत न कुच बिच कचुकी, चुपरी सादी सेत ।
कवि अंकन के अर्थ लौ, प्रगट दिखाई देत ।।'
—बिहारी
सवैया
बाँकी मरोर गटी भृकुटीन लगी अखियाँ तिरछानि तिया की ।
टाँक सी लाँक भई रसखानि सुदामिनि ते दुति दूनी हिमा की ॥
सोहै तरग अनग की अंगनि ओप उरोज उठी छतिया की ।
जोवन जोति सु यौ दमकै उसकाइ दई मनो बाती दिया की ॥२०१॥
शब्दार्थ-टाक=पतली । लाक=लक, कमर । सुदामिनि=सौदामिनी,
व्याख्या भाग २८३.
विजली । दुति छुति, शोभा । अनग = कामदेव । ओप = शोभा । उरोज =
स्तन ।
अर्थ—कोई गोपी राधा की वय सन्धि का वर्णन अपनी सखी से करती
हुई कहती है कि राधा की तिरछी आंखो ने, जो भृकुटी तक फैली हुई है,
गर्वीली वक्रता ग्रहण कर ली है । आनन्द सागर राधा की कमर पतली हो गई
है । उसके हृदय की (शीरर की) शोभा दामिनी से भी अधिक बढ़ गई है ।
उसके अगो मे कामदेव की तरगे शोभायमान है, उसकी छाती के उठे हुए स्तन
भी शोभायुक्त है । उसकी यौवन शोभा इस प्रकार दमक रही है, मानो दीपक
की बाती उकसा दी गई हो; अर्थात् जिस प्रकार दीपक की बाती को बढाने
से धूमिल प्रकाश स्पष्ट हो जाता है, उसी प्रकार राधा के अगो मे भी यौवन
की शोभा स्पष्ट दिखाई दे रही है ।
विशेष—उपमा, अधिक, छेकानुप्रास अलंकार ।
तुलना—१ 'अंग अंग नग जगमगै, दीप सिखा सी देह ।
दिया बढाये हू रहै, बडो उजेरो गेह ॥
—बिहारी
२. 'पलट चली मुसकाय, दुति रहीम उपजाय अति ।
बाती सी उकसाय, मानो दीनी देह की ।'
—रहीम
सवैया
वासर तूँ जु कहूँ निकरै रवि को रथ माँझ अकास अरै री ।
रैन यहै गति है रसखानि छपाकर आँगन ते न टरै री ॥
द्यौस निस्वास चल्यौई करै निसि द्यौस की आसन पाय घरै री ।
तेरो न जात कछू दिन राति विचारे बटोही की बाट परै री ॥२०२॥
शब्दार्थ—वासर = दिन । छपाकर = चन्द्रमा । द्यौस = दिवस, दिन ।
बाह परै = रास्ता रुक जाता है ।
अर्थ—कोई गोपी राधा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है
कि हे राधा ! यदि तू दिन मे अपने घर से बाहर निकल आती है तो तेरे
सौन्दर्य से सूर्य इतना चकित हो जाता है कि उसका रथ आकाश मे ही रुक
जाता है, अर्थात् सूर्य अपनी गति भूलकर एकटक तुझे ही देखता रह जाता
२८४ रसखान-ग्रन्थावली
है । हे आनन्द-सागर राधा ! रात को भी यही दशा होती है । तेरा सौन्दर्य
देखकर चन्द्रमा तेरे आँगन मे ही ठहर जाता है और आगे नही बढता । दिन
मे तो पवन चलता ही रहता है, पर रात मे भी वह दिन की आशा से तेरे
पीछे लगा रहता है, अर्थात् तेरी सुगन्धि का लोभी पवन रात-दिन चलता
रहता है । इस पवन के रात-दिन चलते रहने के कारण तेरा तो कुछ नही
बिगडता, पर बेचारे पथिक का रास्ता रुक जाता है, अर्थात् वह अपने रास्ते
पर चल नही पाता ।
विशेष—अत्युक्ति और व्याजस्तुति अलंकार ।
तुलना—'मेरे कहे हाहा करि नीरे ह्वै निहारी जब,
जेते वट वाट के बटाऊ मारे जात हैं ।'
—आलम
सवैया
जाको लसै मुख चन्द समान कमानी सी भौह गुमान हरै।
दीरघ नैन सरोजहुँ तै मृग खंजन मीन की पाँत दरै ॥
रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधि न जाहि टरै ।
जिहिं नीके नवै कटि हार के भार सो तासो कहै सब काम करै ॥२०३॥
शब्दार्थ—गुमान हरै=गर्व को नष्ट करती है । सरोज=कमल । दरै=
चूर्ण करना । उरोज=स्तन ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! जिसका मुख चन्द्रमा के समान सुशोभित है । कमानी
सी भौंहे गर्व को नष्ट करती है, विशाल हैं नेत्र कमल से बढकर हैं और मृग,
खंजन तथा मीन की पंक्तियों को चूर्ण करने वाले है । आनन्द-सागर स्तनो को
देखते ही ऐसा कौन ऋषि है जो अपनी समाधि से विचलित नही हो जाता ।
जो कटि के हार के बोझ से ही, अपनी सुकुमारता के कारण, नीचे झुक जाती
है, उससे सब काम करने को कहते है ।
विशेष—१. उपमा, व्यतिरेक, वक्रोक्ति, अतिशयोक्ति अलंकार ।
२. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-
ग्रंथावली' में नही है ।
पाठान्तर—इस सवैये की प्रथम दो पंक्तियों का यह रूप भी मिलता है ।
व्याख्या भाग २८५
'यह जाको लसै मुख चन्द-समान कमान-सी भौंह गुमान हरैै।
अतिदीरघ नैन सरोजहूँ ते मृग खंजन मीन की पाँति दरै ॥'
सवैया
प्रेम कथानि की बात चलै चमकै चित चंचलता चिनगारी ।
लोचन वक विलोकनि लोलनि बोलनि मै बतियाँ रसकारी ॥
सोहै तरंग अनंग को अगनि कोमल यौ झमकै झनकारी ।
पूतरी खेलत ही पटकी रसखानि सु चौपर खेलत प्यारी ॥२०४॥
शब्दार्थ-लोलनि = सुन्दर, मधुर । रसकारी = आनन्ददायक । अनंग =
कामदेव । झमकै = ध्वनि करती है । पूतरी = चौसर की गोट ।
अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से चौपड का वर्णन करती हुई कह रही
है कि जब भी प्रेम-कथाओ की चर्चा चलती है तो कृष्ण के मन मे चंचलता
की चिनगारी चमकने लगती है । वे वक्र दृष्टि से देखने लगते है, मधुर बोल
बोलने लगते है और उनकी बाते अत्यधिक आनन्द से भरी हुई होती है ।
उनके अंगो मे कामदेव की लहरे सुशोभित हो जाती है । रसखान कहते हैं कि
उन्होने अपनी प्राणप्रिया के साथ चौपड खेलते हुए अपनी गोट को पटक दिया,
अर्थात् वे अपनी प्रिया के प्रेम मे इतने तल्लीन हुए कि चौपड़ खेलना ही भूल
गये ।
विशेष-अनुप्रास अलकार ।
मानवती राधा
सवैया
वारति जा पर ज्यौ न थकै चहुँ ओर जिती नृपती घरती है ।
मान सकै घरती सो कहाँ जिहि रूप लखै रति सी रती है ।
जा रसखान बिलोकन काज सदाई सदा हरती बरती है ।
तौ लगि ता मन मोहन की अँखियाँ निसि चौस हहा करती है ॥२०५॥
शब्दार्थ-वारति = न्यौछावर करती हुई । ज्यौ = जीव, प्राण । ती =
स्त्रियाँ । मान सकै घर = जो मान धारण कर सके । रती = रत्ती के समान ।
हरती बरती है = आकुल रहती है । तौ लगि = तेरे लिए । निसि द्यौस = रात-
दिन । हहा करती है = अनुनय-विनय करती रहती है ।
अर्थ-मानवती राधा को उसकी सखी समझाती हुई कहती है कि हे
राधे ! जिस कृष्ण पर चारो ओर के राजाओ की सभी स्त्रियाँ अपने प्राणो
२८६ रसखान-ग्रन्थावली
को न्यौछावर करते हुए नही थकती । ऐसी स्त्रियाँ कहाँ है जो कृष्ण से विमुख
होकर मान धारण कर सके, भले ही उनकी सुन्दरता मे रति भी रत्ती के
समान हो, नगण्य हो । जिस आनन्द-सागर कृष्ण को देखने के लिए सभी
स्त्रियाँ सदा ही आकुल रहती है, उसी मनमोहन कृष्ण की आँखे रात-दिन तेरे
लिए अनुनय-विनय करती रहती है । (अत तू अपना मान छोड़कर कृष्ण से
शीघ्र मिल ।)
विशेष-१. यमक, व्यतिरेक, उपमा ।
२. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्था-
वली' मे नही है ।
सवैया
मान की औधि है आधी घरी अरी जौ रसखानि डरै हित के डर ।
कै हित छोड़ियै पारियै पाइनि ऐसे कटाछनही हियरा-हर ॥
मोहनलाल को हाल विलोकियै नेकु कछु किनि छूवै कर सो कर ।
ना करिवे पर वारे है प्रान कहा करि है अब हाँ करिवे पर ॥२०६॥
शब्दार्थ—औधि = अवधि । हित = प्रेम । कै = या तौ । हियरा हर =
हृदय को हर; मन को जीत लो ।
अर्थ-कोई गोपी अपनी मानिनी सखी राधा को समझाती हुई कहती है
कि यदि आनन्द-सागर प्रेम के कारण डर जाये तो मान की आधी घडी होनी
चाहिए, अर्थात् यदि कृष्ण तेरे मान से भयभीत हो गये है तो मुझे अपना
मान छोड देना चाहिए । या तो तुम उनसे प्रेम ही छोड दो, और यदि प्रेम
को नही छोड सकती तो उसके पैरो मे पडकर ऐसी तिरछी दृष्टि से देखो कि
उसके मन को ही जीत लो । तुम अपने वियोग मे कृष्ण का तनिक हाल तो
देखो, वह बेचारा तुम्हारे विरह मे हाथ मल रहा है । वह तुम्हारी 'नही' पर
ही अपने प्राणो को न्यौछावर करता है । न जाने 'हाँ' करने पर वह क्या
करेगा ।
विशेष-परम्परागत वर्णन है ।
सवैया
तू गरवाइ कहा झगरै रसखानि तेरे बस बावरो होसै ।
तौ हूँ न छाती सिराइ अरी करि झार इतै उतै बाझिन कोसै ।
व्याख्या भाग २८७
लालहि लाल कियें अँखियाँ गहि लालहि काल सो क्यो भई रोसै ।
ए विधना तू कहा री पढी बस राख्यो गुपालहिं लाल भरोसै ॥२०७॥
शब्दार्थ—गरवाइ=गर्व करके । सिराइ=ठंडी पडना । करि भार=
डाह करके ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी राधा को समझाती हुई कहती है कि तू
गर्व करके मुझसे क्या झगड़ा करती है। आनन्द सागर कृष्ण तेरे प्रेम मे पागल
होकर तेरे वश मे हो गये है, तो भी तेरी छाती ठंडी नही हुई और डाह करके
फिर भी मुझे वंध्या होने की गाली देती है। कृष्ण तेरे लिए लाल आँखे किये
हुए है, अर्थात् आतुरता से तेरी प्रतीक्षा करते है । कृष्ण को अपने वश मे
करके भी काल की भाँति क्यो क्रोध करती है। हे दैव ! तूने यह विद्या कहाँ
से पढी है कि तूने कृष्ण को अपने प्रेम का झूठा विश्वास दे दिया है और वह
तेरे ही भरोसे रहता है ।
विश ष—अनुप्रास और यमक अलकार ।
सवैया
पिय सो तुम मान कर्यौ कत नागरि आजु कहा किनहूँ सिख दीनी ।
ऐसे मनोहर प्रीतम के तरुनी बरुनी पग पोछै नवीनी ॥
सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख नैननि चैन महारस भीनी ।
रसखानि न लागत तोहिं कछू अव तेरी तिया किनहूँ मति दीनी ॥२०८॥
शब्दार्थ—कत = क्यो । सिख = शिक्षा । वरुनी = बरौनियो से । सुधानिधि
=चन्द्रमा । महारस = अत्यधिक आनन्द ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी मानिनी सखी, राधा की ताड़ना करती हुई
कहती है कि हे चतुर सखि ! तुम अपने प्रिय से क्यो मान कर रही हो ? तुम्हे
आज क्या हो गया है ? किसने तुमको ऐसी शिक्षा दी है ? तुम्हारा प्रिय
तो इतना मनोहर है कि तरुणियाँ उसके पैरो को अपनी बरौनियो से पोछती
है। उसका हास्य सुन्दर है, मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है, उसके नेत्र सुख
देने वाले और अत्यन्त आनन्द से भरे हुए है । ऐसा आनन्द सागर प्रिय अब
तेरा कुछ नही लगता, अर्थात् तू उससे रूठी हुई है। हे तिया ! न जाने किसने
तेरी मति को छीन लिया है जो तू ऐसे मनोहर प्रियतम से मान करके बैठी
हुई है ।
२८८ रसखान-ग्रन्थावली
विशेष-१. अनुप्रास, उपमा अलंकार ।
२ 'तिया' शब्द के प्रयोग मे भर्त्सना का भाव निहित है।
कवित्त
डहडही बौरी मंजु डार सहकार की पै,
चहचही चुहल चहूँकित अलीन की।
लहलही लोनी लता लपटी तमालन पै,
कहकही तापै कोकिला की काकलीन की।
तहतही करि रसखानि के मिलन हेत,
वहवही बानि तजि मानस मलीन की।
महमही मन्द मन्द मारुत मिलनि तैसी,
गहगही खिलनि गुलाब की कलीन की ॥२०६॥
शब्दार्थ —डहडही = फली हुई। सहकार = आम। अलीन की = भौरों
की। लहलही = हरी भरी। लोनी = सुन्दर। काकलीन की = कूजो की।
तहतही = शीघ्रता । रसखानि = आनन्द सागर कृष्ण । वहवही = भद्दी । बानि
= आदत, स्वभाव । मारुत = हवा । गहगही = पूर्ण विकसित ।
अर्थ —कोई गोपी अपनी सखी मानवती राधा से वसन्त ऋतु का वर्णन
करती हुई कहती है कि हे सखि ! आम की बौरो से युक्त तथा फली हुई
सुन्दर डाली पर चारो ओर से भौरो की गूंज आनन्दपूर्वक गूँज रही है। हरी
भरी सुन्दर लताये तमाल वृक्षो से लिपटी हुई है जिनपर कोयले कूज रही
है। शीघ्रता से कृष्ण से मिलने के लिए गोपियाँ अपने हृदय का मलीन स्वभाव
छोडकर आतुर हो गई है। सुगन्धित मन्द मन्द मारुत चल रहा है और गुलाब
की कलियाँ खिलकर पूर्ण विकसित हो गई है।
ऐसे समय मे तेरा मान करना उचित नही है।
सवैया
जो कवहूँ मग पाँव न देत सु तो हित लालन आपुन गौनै ।
मेरो कह्यौ करि मान तजौ कहि मोहन सो वलि वोल सलौनै ॥
सौहै दिवावत हौ रसखानि तूं सौहै करै किन लाखनि लौनै ।
नोखी तूं मानिनि मान कर्यौ किन मान दसत मै कीनौ है कौनै ॥२१०॥
शब्दार्थ —सलौनै = मधुर । सौहै = सौगन्ध । सौहै = सम्मुख । लाखनि =
व्याख्या भाग २८६
लाखों मे सुन्दर मुख । नोखी=विलक्षण ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी मानिनी सखी राधा को समझाती हुई कहती है
कि जो स्त्रियाँ कभी घर से बाहर कदम भी नही रखती, वे भी कृष्ण के लिए
स्वय छिपकर गमन करती है, अर्थात् कृष्ण मे इतना आकर्षण है कि धीरा
भी उनसे मिलने के लिए अधीरा बन जाती है । अत तू मेरा कहना मान
कर अपना मान छोड और मोहन से मधुर-मधुर शब्दो मे बाते कर । रसखान
कहते है कि मै तुझको सौगन्ध दिलाकर कहती हूँ कि हे लाखो मे सुन्दर मुखवाली
तू कृष्ण के सामने जा । हे मानिनी ! तू तो बहुत ही विलक्षण है, वरना
बसन्त-ऋतु मे भी कोई मान करता है ? अत तू मेरा कहना मान और अपना
मान तजकर कृष्ण से बाते कर ।
विशेष—तृतीय और चतुर्थ पक्ति मे यमक अलकार ।
सखी-शिक्षा
सवैया
सोई है रास मैं नैसुक नाच कै नाच नचायौ कितौ सबको जिन ।
सोई है री रसखानि किते मनुहारनि सूँधे चितौत न हो छिन ॥
तो मै धौं कौन मनोहर भाव बिलोकि भयौ बस हाहा करी तिन ।
औसर ऐसो मिलै न मिलै फिर लगर मौडो कनौड़ो करै छिन ॥२११॥
शब्दार्थ—लंगर=शरारती । मौडो=बालक । कनौड़ो=कृतज्ञ ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी को शिक्षा देती हुई कहती है कि हे सखि ।
वह वही कृष्ण है जो रासलीला मे तनिक नाच कर सबको नचाया करता है ।
वही आनन्द-सागर कृष्ण है जो अनेक मनुहारे करने पर भी पलभर के लिए
भी सीधी तरह नही देखता; अर्थात् हर समय शरारत करता रहता है । न
आने तुझ मे वह कौन-से मनोहर भाव देखकर तेरे प्रति आकृष्ट हो गया है ।
ऐसा अवसर शायद आगे मिले या न मिले कि वह शरारती कृष्ण तुझे कृतज्ञ
करे, अर्थात् तेरे प्रति आकृष्ट हो, अत अव जो अवसर मिला है, उसे हाथ से
न जाने दे ।
विशेष—उल्लेख अलकार ।
सवैया
तौ पहिराइ गई चुरिया तिहिं को घर बावरी जाय भरै री ।
वा रसखान को ऐतौ अधीन कै मान करै चलि जाहि परैं री ॥
२६० रसखान-ग्रन्थावली
आवन को पुतरीत हठा करैं नैननि धार अखण्ड ढरै री ।
हाथ निहारि निहारि लला मनिहारिन की मनुहारि करै री ॥२१२॥
शब्दार्थ—ऐतौ अवीर ने=इस प्रकार अपने प्रेम के वश मे करके । चलि
जाहि परै =दूर हट, यह स्त्रियो की भर्त्सना देने की एक प्रकार की गाली है।
मनुहारि= सत्कार ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि ।
तुझे जो मनिहारी चूडियाँ पहना गई, तू जाकर उसका घर क्यो नही भर
देती; अर्थात् उसे काफी धन क्यो नही दे देती । तू ने उस आनन्द-सागर
कृष्ण को इस प्रकार अपने प्रेम के वश मे कर लिया है कि वह तेरे बिना
अब एक पल भी नही रह सकता और अब तू उसके पास जाने मे हिचकिचाती
है, उससे मान करती है । चल दूर हट । तेरे आने के लिए, तुझसे मिलने के
लिए, कृष्ण की आँखे तुझसे अनुनय-विनय करती है और तेरे वियोग मे उसकी
आँखो से निरन्तर आँसू बहते रहते है । तू ने जो चूडियाँ पहन रखी हैं,
इन चूडियो वाले हाथो को देखकर कृष्ण उस मनिहारी का अवश्य सत्कार
करेगे, अर्थात् उसे साधुवाद देगे ।
विशेष—१ यमक अलकार ।
२ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान
ग्रन्थावली' मे नही है ।
सवैया
मेरी सुनौ मति आइ अली उहाँ जौनौ गली हरि गावत है।
हरि है विलोकति प्रानन को पुनि गाढ परे घर आवत है ॥
उन तान की तान तनी ब्रज मैं रसखानि समान सिखावत है।
तकि पाय धरौ रपटाय नही वह चारो सो डारि फँदावत है ॥२१३॥
शब्दार्थ—अली=सखी । जौनौ=जिस । गाढ=विपत्ति । समान=
ज्ञान ।
अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति सचेत रहने के लिए कहती
हुई वर्णन करती है कि हे सखि । मेरी बात को ध्यान से सुनो और जिस
गली मे कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाता हुआ जाता है, उस गली मे बिल्कुल
मत जाओ, क्योकि देखते ही कृष्ण प्राणो को हर लेता है और फिर गोपियाँ
व्याख्या भाग २६१
बेचारी प्रेम की विपत्ति लेकर ही अपने घरो को लौटती है। उसने अपनी
बाँसुरी की तानो का सारे ब्रज मे तान तान रक्खा है, अत. मै तुझसे ज्ञान
की बात कहती हूँ कि बहुत सोच समझकर पैर रखो, क्योकि वह कृष्ण इसी
प्रकार फँसाता है, जिस प्रकार चारा देकर मछली को फँसाया जाता है।
विशेष—१ यमक, श्लेप अलकार।
२. 'तकि पाय धरौ रपटाय नही' मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है।
सवैया
काहे कूँ जाति जसोमति के गृह पोच भली घर हूँ तो रई ही।
मानुष को डसिवौ अपुनो हँसिवौ यह बात उहाँ न नई ही ॥
बैरिनि तौ दृग-कोरनि मे रसखान जो बात भई न भई ही।
माखन सौ मन लै यह क्यो वह माखनचोर के ओर नई ही ॥२१४॥
शब्दार्थ —पोच भली = चाहे कमजोर ही सही। रई = दूध मथने की
लकडी। उहाँ = वहाँ पर। बैरिनि = औरतो का आत्मीयता-सूचक सम्बोधन।
तौ = तेरे। न भई ही = पहले नही थी। माखन सौ = मक्खन के समान
कोमल।
अर्थ—कोई गोपी यशोदा के घर गई और वहाँ से कृष्ण के प्रेम के
वशीभूत होकर लौटी। उसकी भर्त्सना करती हुई उसकी सखी कह रही है कि
तू यशोदा के घर गई ही क्यो ? रई तो तेरे भी पास थी, भले ही वह
कमजोर सही। वहाँ कृष्ण के द्वारा प्रेम का जाल फैलाकर भोली नारियो को
डसना और उन नारियो के फिर अपनी हंसी कराना कोई नई बात नही है।
वहाँ तो प्रतिदिन ऐसा ही होता रहता है। हे बैरिनि ! तेरे नेत्रो मे आज
जो बात मै देख रही हूँ, वह पहले तो नही थी, अर्थात् आज तुम्हारी आँखों
मे प्रेम की मादकता है। अपना मक्खन-जैसा कोमल हृदय लेकर तू उस
माखनचोर की ओर गई ही क्यो थी ?
विशेष—१ उपमा अलकार।
२. अंतिम पक्ति मे 'माखन' और 'माखनचोर' का प्रयोग अत्यन्त
औचित्यपूर्ण है।
३. श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे
यह सवैया नही है।
२६२ रसखान-ग्रन्थावली
सवैया
हेरति बारही यार उसै तुव बावरी बाल, कहा धौ करैंगी ।
जौ कवहूँ रसखानि लखै फिर क्यो हूँ न वीर ही धीर धरैगी ॥
मानि है काहू की कानि नही, जब रूप ठगी हरि रंग ढरैंगी ।
यातै कहौ सिख मानि भटू यह हेरनि तेरे ही पैडे परैंगी ॥२१५॥
शब्दार्थ—हेरति=देखती है । वीर=सखी । कानि=लज्जा, भय । रग=
प्रेम । सिख=शिक्षा । भटू=सखी । हेरनि=देखा । नैडे=पीछे ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि !
तू वार-वार कृष्ण की ओर देखती है । हे पगली ! तू नही जानती कि इसका
परिणाम क्या होगा ? यदि कभी आनन्द-सागर कृष्ण ने तेरी ओर देख लिया
तो, हे सखि ! फिर तू अपना सारा धैर्य खो बैठेगी और उसमे अनुरक्त हो
जायेगी । तब तू किसी भी प्रकार की लज्जा नही पावेगी और कृष्ण के
प्रेम मे रग जायेगी । हे सखि ! इसलिए मैं तुझसे कहती हूँ कि तू मेरी
शिक्षा मान, अन्यथा यह देखना तेरे ही पीछे पड जायेगा, अर्थात् जब तू कृष्ण
से प्रेम करने लगेगी तो फिर तुझे बडी व्याकुलता होगी, तेरा सुख-चैन सब
दूर हो जायेगा ।
सवैया
बाँके कटाछ चितैवो सिख्यो बहुधा वरज्यौँ हित कैं हितकारी ।
तूं अपने ढग की रसखानि सिखावनि देति न हौं पचिहारी ॥
कौन की सीख सिखी सजनी अजहूँ तजि दै बलि जाउं तिहारी ।
नन्द के नन्दन के फन्द अजूं परि जैहै अनोखी निहारिनिहारी ॥२१६॥
शब्दार्थ—कटाछ=कटाक्ष, तिरछी दृष्टि से । हितकारी=प्रेम करने
वाला पति । हौ पचिहारी=मैं कोशिश करके हार गई हूँ । निहारिनिहारी=
देखने वाली ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी मानिनी सखी को समझाती हुई कहती है कि
हे सखि ! तूने बाँकी-तिरछी दृष्टि से देखना तो सीख लिया है, अर्थात् तू
प्रेम करना तो जान गई है, पर प्राय अपना अपने प्रेम करने वाले पति की
भर्त्सना कर देती है । तू तो अपने ही प्रकार की आनन्द-सागर से भरी हुई
युवती है, जो मेरी शिक्षा नही मानती । मैं तो तुझे शिक्षा देते-देते कोशिश
व्याख्या भाग २६३
करके हार गई हूँ। हे सजनी ! तू ने किसकी शिक्षा को ग्रहण कर लिया है ?
अपना मान छोड दे, मैं तुझ पर न्यौछावर होती हूँ। हे-विलक्षण दृष्टि
से देखने वाली ! यदि तू कही कृष्ण के फन्दे मे पड गई तो फिर मुसीबत आ
जायेगी। अत तुझे अपना मान छोड़कर अपने प्रियतम से प्रेम करना ही
उचित है।
सवैया
बैरिन तूँ वरजी न रहै अबही घर बाहिर बैरु वृढैगो।
टोना सु नन्द छुटोना पढै सजनी तुहि देखि विसेपि पढ़ैगो ॥
हसि है सखि गोकुल गाँव सबै रसखानि तबै यह लोक रढ़ैगो।
बैरु चढै घरहि रहि बैठि अटा न चढ़ै बदनाम चढ़ेगो ॥२१७॥
शब्दार्थ = वरजी न रहैं = रोकने पर नहीं रुकती। टोना = जादू।
छुटोना = लडका। विसेप = विशेष। लोक = दुनिया। बैरु = आयु।
अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रेम मे दिवानी अपनी सखी को समझाती
हुई कहती है कि हे सखि । तू रोकने पर भी नही रुकती। यदि तेरा कृष्ण-
के प्रति ऐसा ही लगाव रहा तो घर और बाहर वैर बढ जायेगा। नन्दपुत्र
कृष्ण जादू के मन्त्र से तो सदा ही पढता रहता है, पर तुझे देखकर वह और
भी विशेष रूप से पढेगा। सारा गोकुल गाँव तेरी हँसी उडायेगा और सारी
दुनिया तेरी निन्दा करेगी। अब तेरी आयु चढ रही है; अर्थात् तू युवती
हो रही है, अत तेरा घर के अन्दर बैठना ही ठीक है; अटारी पर चढ़ना
ठीक नहीं है, क्योकि इससे तेरी बदनामी होगी।
विशेष—१. 'वैरिनि' शब्द का प्रयोग आत्मीयता का सूचक है।
२. 'बैरु चढ़े' मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है।
३. अन्तिम पषित मे लक्षणा शब्द-शक्ति और असंगति अलंकार
का प्रयोग भाववर्द्धक है।
सवैया
गोरस गाँव ही मै विचिवो तचिवो नही नन्द-मुखानल झारन ।
गैल गहे चलियै रसखानि तौ पाप बिना डरियै किहि कारन ॥
नाहिं री ना भटू, क्यों करि कै वन पैठत पाइबी लाज सम्हारन ।
कुंजनि नन्दकुमार बसै तहाँ मार बसै कचनार की डारन ॥ २१८ ॥
शब्दार्थ—तचिबो = जलना। नद-मुखानल-झारन = ननद के मुंह की आग
की लपटें। गैल = मार्ग। भटू = सखी। मार = कामदेव।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से गोरस बेचने के लिए बाहर चलने के
लिए कहती है। उसकी बात सुनकर वह सखी कहती है कि हे सखि ! मैं गोरस
गाँव में ही बेचूँगी, क्योंकि ननद के मुख की आग की लपटों में जलना, ननद
की फटकारें सुनना, अच्छा नहीं है। जब मैं बाहर जाती हूँ तो मेरी
ननद कृष्ण और मुझे लक्ष्य करके अनेक प्रकार की मर्मान्तक गालियाँ देती है।
यह सुनकर वह गोपी कहती है कि हम अपने रास्ते चली जायेंगी। जब तुम्हारे
मन में कोई पाप ही नहीं है तो फिर तुम अपने मन में क्यों डरती हो ? यह
सुनकर फिर सखी कहती है कि सखि ! मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूँगी, क्योंकि
उस वन में घूमने पर जहाँ कृष्ण रहते हैं, किस प्रकार अपनी लाज संभाली जा
सकती है। वहाँ कुंजों में तो कृष्ण रहते हैं और कचनार की डालियों में
कामदेव निवास करता है।
कहने का भाव यह है कि उस वन का, जहाँ कृष्ण रहते हैं, वातावरण ही
इतना मादक है कि वहाँ पहुँचते ही मन इतना कामपूर्ण हो जाता है कि फिर
उचित-अनुचित का ध्यान ही नहीं रहता। अतः मुझे गाँव से बाहर निकलना
उचित नहीं है।
सवैया
वार ही गोरस बेंच री आजु तू माइ के मूड चढ़े कत मौड़ी।
आवत जात ही होइगी साँझ भटू जमुना मतरौंड लौं औंड़ी॥
पार गए रसखानि कहै अँखियाँ कहूँ होंहिगी प्रेम कनौड़ी।
राधे बलाइ ल्यौं जाइगी वाज अबै ब्रजराज सनेह की डाँडी॥२१६॥
शब्दार्थ—वार ही = इस पार ही। मौड़ी = सखी। मतरौंड = मथुरा और
वृन्दावन के बीच का एक स्थान। प्रेम कनौड़ी = प्रेम के वशीभूत।
अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज तू अपना
गोरस नदी के इस पार ही बेच ले और नदी के उस पार न जा। क्योंकि
यमुना पार से मतरौंड तक जाते-आते ही साँझ हो जायेगी। दूसरा कारण यह
है कि नदी के उस पार जाने पर आनन्द सागर कृष्ण मिल जायेंगे, जिन्हें देखते
ही न जाने आँखें प्रेम के वशीभूत हो जायें। फिर यह बात राधा तक भी पहुँच
जायेगी और सारे ब्रज में कृष्ण के प्रेम की डोडी पिट जायेगी।
व्याख्या भाग २६५
तुलना—'हाय दई न बिसाखी सुनै कछु है जग बाजत नेह की डौडी।'
— घनानन्द
कवित्त
ब्याही अनब्याही ब्रज माही सब चाही तासी,
दूनी सकुचाही दीठि परै न जुन्हैया की।
नेकु मुसकानि रसखानि को विलोकत ही,
चेरी होति एक बार कुंजनि दिखैया की॥
मेरो कह्यो मानि अन्त मेरो गुन मानिहै री,
प्रात खात जात ना सकात सौहै मैया की।
भाई की अटक तौ लौ सासु की हटक जौ लौ,
देखी ना लटक मेरे दूलह कन्हैया की॥ २२०॥
शब्दार्थ—जुन्हैया = चाँदनी। चेरी = दासी। हटक = बाधा।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छवि का वर्णन करती हुई
कहती है कि ब्रज की जितनी भी विवाहित नारियाँ और अविवाहित युवतियाँ
है, सब कृष्ण को चाहती है, उससे प्रेम करती है। वैसे वे इतनी लज्जाशील
है कि चाँदनी की दृष्टि भी उन पर न पड जाये, इसलिए दूने सकोच के
साथ वे अपने घर से बाहर निकलती है। किन्तु उस तथा कुन्ज
दिखाने वाले कृष्ण की तनिक सी मुस्कराहट को भी देख कर वे तुरन्त उसकी
दासी बन जाती है। हे सखि! तुम मेरा कहना मानो और अन्त मे तुम मेरा
अहसान स्वीकार करोगी। तुम्हे अपनी माँ की सौगन्ध है, तुम कभी भी
प्रात काल बिना खाना खाये बन मे न जाना, अन्यथा वहाँ सारे दिन तुम्हे भूखा
रहना पड़ेगा। भाई की बाधा और सासु की रुकावट मेरे मार्ग मे तब तक ही
बनी हुई है, जब तक उन्होने मेरे प्रिय कृष्ण की छवि को नही देखा है; अन्यथा
वे स्वयं भी उस छवि पर मुग्ध हो जायेगी।
सवैया
मो हित तो हित है रसखान छुपाकर जानहि जान अजानहि।
सोउ चबाव चल्यौ चहुँधा चलि री चलि री खत तोहि निदानहि॥
जो चहियै लहियै भरि चाहि हिये सहियै हित काज कहा नहि।
जान दै सास रिसान दै नन्दहि पानि दै मोहि तू कान दै तानहि॥२२१॥
शब्दार्थ—मो हित तो हित है = मेरी भलाई तेरी ही भलाई मे है।
२६६ रसखान-ग्रन्थावली
छपाकर = चन्द्रमा। चवाव = निन्दा। खत = हानि। निदानहिं = अन्त में।
जो चहियै लहियै भरि चाहि = यदि कृष्ण को प्रेम पूर्वक आँख भरकर देखना
चाहती है। हित काज = प्रेम के लिए। पानि = हाथ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी को शिक्षा देती हुई कहती है कि मेरी
भलाई तेरी ही भलाई है। अर्थात् मैं जो कुछ कह रही हूँ वह सब तेरी ही
भलाई के लिए कह रही हूँ। तू चन्द्रमा को जानकर भी अजान क्यो बनी हुई
है; अर्थात् चन्द्रमा भावोद्दीपक है, इस बात को जानकर भी तू कृष्ण से क्यो
नही मिल रही है। तेरे कलंक की चर्चा चारो ओर चल रही है और इस चर्चा
से अन्त मे तुझे ही हानि होगी, अत तू चल कर कृष्ण से मिल। यदि तू
कृष्ण को प्रेमपूर्वक आँख भरकर देखना चाहती है तो तुझे सभी प्रकार की
निन्दा सहन करनी होगी, क्योकि प्रेम के लिए क्या कुछ नही सहा
जाता। अत तू सास की चिन्ता छोड़, ननद को क्रुद्ध होने दे, मुझे अपना हाथ
दे; अर्थात् मेरे ऊपर विश्वास कर और कृष्ण की तानो को सुन; अर्थात् कृष्ण
से मिल।
विशेष—१. तृतीय पंक्ति मे यमक अलकार ।
२. यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रस-
खान ग्रन्थावली' मे नही है।
सवैया
तेरी गलीन मै जा दिन ते निकसे मन मोहन गोधन गावत ।
ये ब्रज लोग सो कौन सी बात चलाइ कै जो नहिं नैन चलावत ॥
वे रसखानि जो रीझिहै नेकु तौ रीझि कै क्यो न बनाइ रिझावत ।
बावरी जो पै कलंक लग्यौ तो निसंक ह्वै क्यों नहीं अंक लगावत ॥२२२॥
शब्दार्थ—गोधन = गोचारण का गीत। अंक = हृदय।
अर्थ—कृष्ण प्रेम से विमुख किसी गोपी को उसकी सखी समझती हुई
कहती है कि जिस दिन से तेरी गली मे से श्रीकृष्ण गोचारण का गीत गाते
हुए निकले है, उस दिन से न जाने ब्रज मे लोगो ने कौन सी बात चला दी है
कि तेरे नेत्र ही पटकने बन्द हो गये है। यदि आनन्द सागर कृष्ण तुझ पर
तनिक भी रीझ गये है तो तू अच्छी प्रकार से रिझाकर उन्हे अपने वश मे
क्यो नहीं करती, यदि तुझे प्रेम का कलंक लग ही गया है तो निर्भय होकर
कृष्ण को अपने हृदय से क्यो नही लगाती ?
व्याख्या भाग २६७
विशेष—१. 'बात' का क्लिष्ट प्रयोग है ।
२ अंतिम पंक्ति मे शब्द एव भाव छटा अनुपम है ।
तुलना—१. 'कौन संकोच रह्यो है निवाज,
जो तू तरसै उनहूँ तरसावत ।
बावरी जो पै कलंक लग्यो,
तो निसंक ह्वै क्यो नहि अंक लगावत ।
—निवाज
२. विस्नु विरंचि बिचारि मनावत,
गावत कीरति मोद पगावत ।
बावरी जो पै कलंक लग्यौ,
तो निसंक ह्वै क्यो नही अंक लगावत ।'
—मोहन
३ होनी हुती सो तो होय चुकी,
इन बातन मे अब लाभ कहा है ।
लागे कलंकहु अंक नही,
तो सखि भूल हमारी महा है ।'
—हरिश्चन्द्र
सवैया
जाहु न कोऊ सखी जमुना जल रोके खड़ो मग नन्द को लाला ।
नैन नचाइ चलाइ चितै रसखानि चलावत प्रेम को भाला ॥
मैं जु गई हुती बैरन बाहर मेरी करी गति टूटि गौ माला ।
होरी भई कै हरी भए लाल कै लाल गुलाल पगी ब्रजवाला ॥ २२३ ॥
शब्दार्थ—मग = मार्ग । नन्द को लला = कृष्ण ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि !
किसी को भी यमुना जल भरने नही जाना चाहिए, क्योकि कृष्ण मार्ग रोके
हुए खड़ा है । वह अपनी आँखो को नचाकर मन को चंचल बना कर प्रेम का
भाला चलाता है । मैं जो बाहर निकल गई तो मेरी उस कृष्ण ने ऐसी दुर्गति
की कि मेरे गले की माला भी टूट कर गिर गई । यह होली है या कृष्ण के
द्वारा हरण है, क्योकि सभी ब्रजवालाएँ कृष्ण के गुलाल से लाल हो रही हैं ।