रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २६७
विशेष—१. 'बात' का क्लिष्ट प्रयोग है ।
२ अंतिम पंक्ति मे शब्द एव भाव छटा अनुपम है ।
तुलना—१. 'कौन संकोच रह्यो है निवाज,
जो तू तरसै उनहूँ तरसावत ।
बावरी जो पै कलंक लग्यो,
तो निसंक ह्वै क्यो नहि अंक लगावत ।
—निवाज
२. विस्नु विरंचि बिचारि मनावत,
गावत कीरति मोद पगावत ।
बावरी जो पै कलंक लग्यौ,
तो निसंक ह्वै क्यो नही अंक लगावत ।'
—मोहन
३ होनी हुती सो तो होय चुकी,
इन बातन मे अब लाभ कहा है ।
लागे कलंकहु अंक नही,
तो सखि भूल हमारी महा है ।'
—हरिश्चन्द्र
सवैया
जाहु न कोऊ सखी जमुना जल रोके खड़ो मग नन्द को लाला ।
नैन नचाइ चलाइ चितै रसखानि चलावत प्रेम को भाला ॥
मैं जु गई हुती बैरन बाहर मेरी करी गति टूटि गौ माला ।
होरी भई कै हरी भए लाल कै लाल गुलाल पगी ब्रजवाला ॥ २२३ ॥
शब्दार्थ—मग = मार्ग । नन्द को लला = कृष्ण ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि !
किसी को भी यमुना जल भरने नही जाना चाहिए, क्योकि कृष्ण मार्ग रोके
हुए खड़ा है । वह अपनी आँखो को नचाकर मन को चंचल बना कर प्रेम का
भाला चलाता है । मैं जो बाहर निकल गई तो मेरी उस कृष्ण ने ऐसी दुर्गति
की कि मेरे गले की माला भी टूट कर गिर गई । यह होली है या कृष्ण के
द्वारा हरण है, क्योकि सभी ब्रजवालाएँ कृष्ण के गुलाल से लाल हो रही हैं ।