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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 368 में से

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पृष्ठ 78

: ४ :
रसखान का प्रेम-दर्शन
प्रेम शब्द 'प्रिय' का भाववाचक रूप है । 'प्रिय' शब्द का अर्थ है तृप्ति
प्रदान करने वाला—प्रीणातीति प्रिय. । अतः प्रेम उस प्रभाव को कह सकते है
जो हृदय को आनन्द देकर तृप्त करने वाला हो ।
प्रेम-भाव की महत्ता असदिग्ध है । इसीलिए भारतीय एवं पाश्चात्य साहित्य
दोनो मे इसके स्वरूप का विस्तार से प्रतिपादन किया गया है । भारतीय
आचार्यों के एतद्विषयक प्रमुख मत निम्नलिखित है—
१ चित्त रूपी समुद्र मे जब सत्त्व गुण का जल भर जाता है तो उसमें
दृष्टि, परिचय, हार्द्र तथा प्रेम नाम की चार प्रकार की तरंगे उठा करती है ।
प्रेम का मूलोपादान आत्मा का सत्त्व गुण है । विषय तो केवल निमित्त कारण
है । वह उद्दीपन है और भाव की जिस स्थिति को प्रेम कहते हैं, वह अनुभूति
की चरम कोटि है । उसमे पूर्व तीन विकास-क्रम दृष्टि परिचय और हार्द्र समाप्त
हो लेते है । इनमे दृष्टि चित्त की वह वृत्ति है जिसमे चंचल चित्त विषय की
ओर हठात् प्रवृत्त होता है । परिचय से विषय के विविध संस्कार मन मे उत्पन्न
होते है । दोषो पर ध्यान न देना हार्द्र है । जीव मे आत्मा का ही रूप जो रस
है वह जिस उपाधि का आश्रय लेकर श्रृं गार बनता है, वह उपाधि प्रेम है;
अर्थात् प्रेम रसमय आत्मा के बहिर्विकास का साधन है, उसी का अंभूगत तत्त्व
है ।
—प्रेमरसायनकार विश्वनाथ
२. अंत करण की वृत्ति जिससे वस्तु के संयोगकाल मे भी वियोग-सा बना
रहता है, प्रेम है ।
—शांडिल्य
३ चित्त की द्रवावस्था को प्रेम कहते है ।
—आचार्य भरत