रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ रसखान-ग्रन्थावली
आठवाँ पद है -
'अंग भभूत लगाये महा सुख है कोउ ऐसो सो प्रेमहु पागै ।
नाथ को नाम सुनै विगसै हियो कान्ह को नाम सुनै अनुरागे ।
जोग लिए हरि प्यारो मिलै तो पै कान कटाये कहा दुख लागै ।
मोहन के मन मानी यही तो सबै री कहौ मिलि गोरख जागै ॥'
यह सवैया किसका रचा हुआ है, यह बताना असम्भव है । नवीन ने इसे
किसी नाथ कवि का माना है । यह भ्रम नाथ शब्द के कारण हुआ है । यह
शब्द नाथपंथियो के लिए प्रयुक्त हुआ है ।
नवाँ पद है-
'कैसा है यह देश निगोरा । जग होरी ब्रज होरा ।
मै जल जमुना भरन जात रही, देखि बदन मेरा गोरा ।
मोसो कहै चलो कुजन मे, तनक-तनक से छोरा ।
परे आँखिन मे डोरा ॥
जियरा देखि डरात सखी री, लाज भरम को ओरा ।
का बूढे का लोग लुगाई, एक ते एक ठिठोरा ।
न काहू सो काहू को जोरा ।
मन मेरो हर्यो नन्द के ने सखि, चलत लगावत चोरा ।
कहै रसखान सिखाइ सखन सो, सब मेरा अंग टटोरा ।
न मानत करत निहोरा ॥'
इस पद को श्री अखिलेश मिश्र ने १८ सितम्बर १६६० के 'स्वतत्र भारत'
मे रसखान का मानकर उद्धृत किया है । इस भ्रम का कारण 'कहै रसखान'
वाक्यांश है । यहाँ रसखान का अर्थ कृष्ण है ।
दसवाँ पद है-
'परम चतुर पुनि रसिक वर, कैसो हू नर होय ।
बिना प्रेम रूखो लगै, बादि चतुरई सोय ॥'
गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित 'प्रेमयोग' नामक पुस्तक मे यह दोहा
रसखान के नाम से दिया गया है । अन्यथा कोई प्रमाण उपलब्ध नही होता ।