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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

५६ रसखान-ग्रन्थावली
तीसरा छंद है—
'तट की न घट परै मग की न पग धरै,
घर की न कछु करै बैठी भरै सांसु री ।
एकै सुनि लोट गई एकै लोट पोट भई,
एकनि के दृगनि निकसि आए आंसु री ।
कहै रसखान सो सबै ब्रज वनिता वधि,
वधिक कहाय हाय भई कुल हांसु री ।
करिये उपाय बांस डारियै कटाय, नाहिं
उपजैगो बांस नाहिं बाजै फेरि बांसुरी ॥'
'शिवसिंह-सरोजकार' ने इसे रसनायक कृत माना है और 'कहै रसखान'
के स्थान पर 'कहै रसनायक' पाठ दिया है ।
चौथा पद है—
'भिक्षुक तिहारो कहाँ बलि मखशाला जहाँ,
सर्पन को संगी कहाँ व्है है छीरनिधि मे ।
ऐ री बहुरंगी बैलवारो कहाँ नाचत है,
कीने तिरभंगा कही व्है है ग्वालगन मे ।
चाउर चवैया कहाँ होय है सुदामा पास,
विष को अहारी कहाँ पूतना के घर मे ।
सिन्धु सुता आन मिली तर्क सो तरक करी,
गिरजा मुसकाति जाति झारी लिए कर मे ॥
केवल प्रभुदत्त ब्रह्मचारी द्वारा सम्पादित 'रसखान पदावली' मे यह कवित्त
रसखान के नाम से मिलता है। यह कवित्त संस्कृत-कवियो की प्रवृत्ति के अधिक
निकट है । अतः निश्चय ही यह संस्कृत के किसी श्लोक का अनुवाद है ।
पाँचवा पद है—
'खेलिए फाग निसंक व्है आज मयंकमुखी कहै भाग हमारो ।
लैहु गुलाल दुऔ कर मे पिचकारिक रंग हिये महं डारो ।
भावै सु मोहि करो रसखान जू पांव परो जनि घूंघट टारो ।
बीर की सौंह हौं देखिहौं कैसे अबीर तो आँख बचाय के डारो ॥'