रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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समीक्षा भाग
पाँचवे पद मे उस विरहिणी गोपी का वर्णन है जिसे सास और ननद ने
कृष्ण से फाग खेलने की अनुमति नही दी।
संदिग्ध पद
इस शीर्षक के अन्तर्गत १० छंद है। डा० याज्ञिक ने अनेक प्रमाणो द्वारा
यह सिद्ध किया है कि ये छंद रसखान-रचित नही है।
पहला पद है—
हेरत कुंज भुजा धरे स्याम सौ नेक तबै हँसती न लुगाई।
लाज न कानि हुती जिय माँझ सुभेटत जो मग मांहि कन्हाई।
हेरै परै न गुपाल सखी इन जोबन आनि कुमात चलाई।
होत कहा अब के पछताए जो हाथ ते छूटि गई लरिकाई॥'
यह सवैया किसी रामगोपाल कवि का रचा हुआ है। प्रबोध रस सुधा-
सागर मे इसे राजगोपाल के नाम से ही सगृहीत किया गया है। नवीन ने
भी इसे राजगोपाल के नाम से ही दो बार उद्धृत किया है। एक बार परकीया
के वर्णन मे और दूसरी बार व्रजकेलि के वर्णन मे। सरदार कवि के श्रृंगार-
संग्रह मे भी यह छंद रामगोपाल के नाम से ही मिलता है। इस सवैया की
तीसरी पंक्ति के पूर्वाद्ध मे रायगोपाल (गुपाल) की छाप भी अंकित है।
दूसरा पद है—
'मीरा की चटक और लटक नव कुंडल की,
भौंह की मटक मोहि आँखिन दिखाउ रे।
मोहन सुजान गुन रूप के निधान कान्ह,
बाँसुरी बजाय तन तपन सिराउ रे।
ए हो बनवारी बलिहारी जाऊँ तेरी आज,
मेरी कुज आय नेक मीठी तान गाउ रे।
नंद के किसोर चितचोर मोरपंख बारे,
बंसीवारे साँवरे पियारे इत आउ रे॥'
'शिवसिंह-सरोजकार' ने इस कवित्त को आदिल कवि द्वारा रचित माना है।
इसीलिए उसने 'मोहन सुजान' के स्थान पर 'आदिल सुजान' पाठ दिया है।