रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग ३०६
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सजनी ! जब से मैंने
यह सुना है कि मथुरा नगरी मे वर्षाऋतु आ गई है और कोयल तथा मोर
प्रेम के स्वरो मे बोलने लगे है, तब से हर समय गोपियाँ चातक की भाँति
पी-पी पुकार रही है । लेकिन हे सखि ! यह तो बताओ कि उस बैरी अहीर
को (कृष्ण को) इन गोपियो की विरह-वेदना का कहाँ तक अनुभव हुआ है;
वह तो अत्यन्त निष्ठुर और पाषाण-हृदय है ।
विशेष—१. प्रकृति का उद्दीपन रूप मे परम्परागत वर्णन ।
२. उपमा अलंकार ।
३ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित
'रसखान-ग्रन्थावली' मे नही है ।
सवैया
मग हेरत धूं धरे नैन भए रसना रट वा गुन गावन की ।
अगुरी गनि हार थकी सजनी सगुनौती चलै नहि पावन की ।
पथिकी कोउ ऐसो जु नाहिं कहै सुधि है रसखान के आवन की ।
मनभावन आवन सावन मे कही औधि करी डग वावेन की ॥२४२॥
शब्दार्थ—मग हेरत=रास्ता देखते हुए । धूँ धरे = धुंधले । रसना =
जीभ । सगुनौती = शुभ शकुन । औधि = आने की अवधि । डग वावेन की =
वामनावतार के डगो की भाँति निरन्तर बढती हुई ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपनी विरहा 'वस्था का वर्णन करती
हुई कहती है कि हे सखि ! प्रियतम कृष्ण का रास्ता देखते हुए मेरे नेत्र धुंधले
पड़ गये हैं; उसके गुणो का गान करती-करती जीभ थक गई है । उसके आने
के दिनो को गिनती-गिनती अगुलियाँ थक गई है, लेकिन उनके आने का कोई
भी शुभ शकुन प्राप्त नही होता । कोई भी ऐसा पथिक नही आता जो कृष्ण
के आगमन का समाचार दे । कृष्ण सावन के महीने मे आने की कह गये थे,
पर अभी तक नही आये । उनके आने की अवधि तो वामनावतार की तरह
निरन्तर, बढती ही जा रही है ।
विशेष—१. उपका अलंकार ।
२. विरह का परम्परागत वर्णन ।
३ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-