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सर्वकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 368 में से

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पृष्ठ 237

२२० रसखान-ग्रन्थावली
सवैया
आज महूँ दधि वेचन जात ही मोहन रोकि लियौ मग आयौ ।
माँगत दान मे आन लियौ सु कियौ निलजी रस जोवन खायौ ॥
काह कहूँ सिगरी री विथा रसखानि लियौ हसि के मुसकायौ ।
पाले परी मैं अकेली लली, लला लाज लियो सु कियो मनभायौ ॥१०१॥
शब्दार्थ—निलजी=लज्जा-रहित । सिगरी=सारी । विथा=व्यथा ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! आज जब मैं
दही बेचने के लिए जा रही थी तो कृष्ण ने आकर मेरा रास्ता रोक लिया ।
उसने दही का दान मागा, किन्तु उस दान के बदले मे उसने मुझे लज्जा-रहित
करके यौवन रस का आनन्द लिया। हे सखि ! मैं अपनी समस्त व्यथा का क्या
वर्णन करूँ, आनन्द सागर कृष्ण ने हँस-हँस कर मेरा यौवन दान लिया। मैं
अकेली ही उसे मिल गई थी, अत मै कुछ कर भी नही सकती थी । उसने मेरी
लज्जा ले ली और जो चाहा वही किया ।
विशेष—१ भावो की सम्मानित अभिव्यक्ति प्रशंसनीय है ।
२. अंतिम पक्ति मे अनुप्रास अलंकार है ।
सवैया
पहले दधि लै गई गोकुल मे चख चारि भए नटनागर पै ।
रसखानि करी उनि मैनमई कहै दान दे दान खरे अर पै ॥
नख तें सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भाँति कँपे डर पै ।
मनौ दामिनि सावन के घन मे निकसे नही भीतर ही तरपै ॥१०२॥
शब्दार्थ—चाव=आँख । मैनमई=प्रेम से परिपूर्ण । दामिनी=बिजली ।
अर्थ—दानलीला का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कह
रही है कि पहले मै गोकुल मे दही ले गई । वहाँ मुझे कृष्ण मिल गये जिनसे
आँखे चार हुईं । उन्होने मुझे प्रेम परिपूर्ण कर दिया और दही के दान के
लिए अडकर खडे हो गये । मेरी सारी सखियाँ सिर से पैर तक अपने नीले
वस्त्र को लपेटे हुए डर से काँप रही थी । वस्त्रो मे लिपटा हुआ उनका सौन्दर्य
ऐसा प्रतीत होता था, मानो सावन मे उमडे हुए बादल मे से बिजली की द्युति
न निकलने के कारण अन्दर ही अन्दर तडप रही हो ।
विशेष—उत्प्रेक्षा अलंकार ।