रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२८ रसखान-ग्रन्थावली
इस सवैये की अन्तिम पंक्ति मे संदेह अलंकार है । इस अलंकार का एक
अन्य उदाहरण और देखिये —
'दूध दुह्यौ सीरो पर्यौ तातो न जमायो कर्यो,
जामन दयौ सो घर्यौ घर्यौई खटाइगौ ।
आन हाथ आन पाइ सब ही के तब ही ते,
जब ही ते रसखानि ताननि सुनाइगौ ।
ज्यौही नर त्यौही नारी तैसी यै तरुन वारी,
कहियै कहा री सब ब्रज बिललाइ गौ ।
जानियै न आली यह छोहरा जसोमति को,
बांसुरी बजाइगौ कि विष बगदरइ गौ ॥'
१५. असंगति—कारण-कार्य की स्वाभाविक संगति के अभाव मे असंगति
अलंकार होता है । यथा—
'श्री वृषभान की छान धुजा अटकी लरकान ते झान लई री ।
वा रसखान के पानि की जानि छुडावति राधिका प्रेम मई री ।
जीवन-मूरी सी नेम लिये इनहूँ चितयौ उनहूँ चितई री ।
लाल लली दृग जोरत ही सुरधानि गुडी उरझाय दई री ।''
यहाँ सुलझाने वाली गुडी उलझा देती है । अत असंगति अलंकार है ।
इस विवेचन के पश्चात् यह कहना कठिन नही कि रसखान की अलंकार-
योजना बहुत ही सफल और प्रभाववर्द्धक है । इन्होने अलंकारो का प्रयोग श्रम
द्वारा नही किया, वरन् ये तो स्वत भावावेग मे आ गये है । स्वाभाविक रूप
से आये हुए अलंकार भाषा मे अधिक प्रभाव और गति उत्पन्न कर देते हैं ।
यह निर्विवाद मत है । जहाँ अलंकार अभिव्यक्ति के साधन और सहायक होते
है, वही इनका प्रयोग सार्थक होता है । रसखान की अलंकार-योजना ऐसी
ही है ।