रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १२७
का साधर्म्य वा वैधर्म्य के द्वारा समर्थन किया जाये, वहाँ अर्थान्तरन्यास अल-
कार होता है । यथा—
'मोहक रूप छकि बन डोलति घूमति री तजि लाज विचारै ।
बक विलोकनि नैन विसाल सु दम्पति कोर कटाछन मारै ।
रगभरी मुख की मुसकान लखे सखी कौन जू देह सम्हारै ।
ज्यौ अरविन्द हिमन्त-करी झकझोरि कै तोरि मरोरि कै डारै ।'
यहाँ मुसकान विशेष का हिमन्त-करी सामान्य से साधर्म्य के द्वारा समर्थन
किया गया है । अत अर्थान्तरन्यास अलकार है ।
१३. प्रतीप—जहाँ उपमेय को उपमान कलिपत कर लिया जाये, वहाँ
प्रतीप अलकार होता है । यथा—
'मोहन के मन की सब जानति जोहन के पग मोहि लियो मन ।
मोहन सुन्दर आनन चंद ते कुंजन देख्यौ मै स्याम सिरोमन ।
ता दिन ते मेरे नैननि लाज तजी कुलकानि की डोलति हौ बन ।
कैसी करौ रसखानि लगी जकरी पकरी पिय के हित को मन ॥'
यहाँ चन्द्र की अपेक्षा आनन का उत्कर्ष वर्णित है । अत. प्रतीप अलकार
है । इस अलकार के अन्य उदाहरण ये है—
१. 'कल काननि कु डल मोरपखा उर पै वनमाल विराजति है ।
मुरली कर मै अधरा मुसकानि-तरग महाछवि छाजति है ।
रसखानि लखै तन पीत पटा सत दामिनि की दुति लाजति है ।
वहि बाँसुरी की धुनि कान परै कुलकानि हियो तजि भाजति है ॥'
२. 'सोई हुती पिय की छतियाँ लगि बाल प्रवीन महा मुद मानै ।
केस खुने घहरै बहरै फहरै छवि देखत मैन अमानै ।
वा रस मे रसखानि पगी रति रैन जगी अखियाँ अनुमानै ।
चन्द पे बिम्ब औ बिम्ब पै कैरव कैरव पै मुकता न प्रमानै ।'
१४ संदेह—जहाँ किसी वस्तु के सम्बन्ध मे सादृश्य-मूलक संदेह हो,
वहाँ संदेह अलकार होता है । यथा—
'वा मुख की मुसकानि भटू अखियानि ते नेकु टरै नहि टारी ।
जौ पलकैं पल लागति है पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी ।
दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम गह्यौ बजमारी ।
प्रेम की बानि कि जोग कलानि गही रसखानि विचार विचारी ॥'