रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १२५
रैनि अँधेरी मे लै बसुदेव महावन मै अरगै धरि आयौ ।
काहु न चौजुग जागत पायौ सो राति जसोमति सोवत पायौ ॥’
जिस कृष्ण को योगी भी अपनी जागृत अवस्था में प्राप्त नही कर सकते,
वही यशोदा को आसानी से प्राप्त हो गया । अत यहाँ समाधि अलकार है ।
७. उल्लेख—जहाँ एक ही वर्णनीय विषय का विभिन्न-भेद से अनेक
प्रकार का वर्णन हो, वहाँ उल्लेख अलंकार होता है । निम्नलिखित सवैये मे
कृष्ण के अनेक रूपो का वर्णन है—
‘वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत है रैन-दिन
सदाशिव सदा ही भरत ध्यान गाढै है ।
वेई विष्णु जाके काज मानी मूढ राज रक,
जोगी जती है कै सीत सह्यौ अग डाढै है ।
वेई ब्रजचद रसखानि प्रान प्राननि के,
जाके अभिलाख लाख लाख भाँति बाढै है ।
जसुधा के आगे वसुधा के मान-मोचन ये,
तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढै है ॥’
इसी प्रकार—
‘सोई है रास मै नैसुक नाचि कै नाच नचायौ कितौ सबको निज ।
सोई है की रसखानि किते पउहारनि सूधेँ चितौत न हो छिन ।
तो पै धौ कौन मनोहर भाव बिलोकि भयौ बस हा हा करी तिन ।
औसर ऐसो मिलै न मिलै फिर लगर मौडो कनौडो करै किन ॥’
मे भी उल्लेख अलंकार है ।
८. अत्युक्ति—सम्पति, सौन्दर्य, शौर्य, औदार्य, सौकुमार्य आदि गुणो के
मिथ्या वर्णन को अत्युक्ति अलंकार कहते है । रसखान ने कृष्ण-प्रीति के
प्रतिपादन में इस अलंकार का प्रयोग किया है । यथा—
‘कचन-मदिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाइ सदा झलकैयत ।
प्रात ही ते सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत ।
यद्यिप दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मघवा ललचैयत ।
ऐसे भये तौ कहा रसखानि जौ साँवरे ग्वार सो नेह न लैयत
इस सवैये मे ककृष्ण की प्रीति बढा-चढाकर वर्णन करने के कारण अत्युक्ति
अलंकार है ।