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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 368 में से

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१२४ रसखान-ग्रन्थावली
तक पूर्ण परिश्रम के साथ उस उपमा को खोज रहे हैं । यह कथन प्रस्तुत को
बढा-चढाकर कहने का द्योतक है । अतः यहाँ अतिशयोक्ति अलकार है । इस
अलकार के अन्य उदाहरण ये हैं—
१. 'जाको लसै मुख चंद समान कमानी सी भौह गुमान हरै ।
दीरघ नैन सरोजहुँ तै मृग खंजन मीन की पात दरै ।
रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन सपाधि न जाहि टरै
जिहिं नीके नवै कटि हार के भार सो तामो कहै सब काम करै ।"
२. गोकुल नाथ वियोग प्रलै जिमि गोपिन नद जसोमतिजू पर ।
बहि गयौ अँसुवान प्रवाह भयौ जल मैं व्रजलोक तिहूहूँ पर ।
तीरथराज सी राधिका प्रान सु तो रसखान मनौ ब्रज भू पर ।
पूरन ब्रह्म है ध्यान रह्यौ पिय औधि अखैवट पात के ऊपर ॥
५. विरोधाभास—जहाँ कथन मे विरोध का आभास हो, पर वास्तव मे
विरोध न हो, यहाँ विरोधाभास अलकार होता है । रसखान ने इसका कुशलता
से प्रयोग किया है । यथा --
'सकर से सुर जाहि जपै चतुरानन ध्यानन धर्म बढावै ।
नैक हिये जिहि आवत ही जड मूढ महा रसखान कहावै ।
जा पर देव अदेव भू-अगना वारत प्रानन प्रानन पावै ।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥'
इस सवैये की तीसरी पंक्ति मे प्रयुक्त 'वारत प्रानन प्रानन पावै' ये
विरोधाभास अलकार है । इसी प्रकार--
'एरी चतुर सुजान, भयौ अजान हि जान कै ।
तजि दीनी पहचान, जान अपनी जान को ॥
मे पी 'भयौ अजान हि जान कै' के कारण विरोधाभास अलकार है ।
६ समाधि- जहाँ अचानक और कारणो के आ पडने से काम सुगम हो
जाये, वहाँ समाधि अलकार होता है । इसे समहित अलकार भी कहते है ।
रसखान ने इस अलकार का अधिक प्रयोग नही किया, फिर जो उदाहरण है, वे
पूर्णतया प्रभावपूर्ण है । यथा-
'कम कुढ्यौ सुनि वानी अकास की ज्यावनहारहि मारन धायौ ।
भादव साँकरी आठई को रसखान महाप्रभु देवकी जायौ ।

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