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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 286 में से

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पृष्ठ 223

२२८ रसिकप्रिया
देखि तेरी सूरति की मूरति बिसूरति हौं,
लालन को दृग देखिबे कों ललचाति है।
चलिहै क्यों चंदमुखी कुचनि के भार भएँ,
कचनि के भार तौ लचकि लंक जाति है ॥१३॥
शब्दार्थ—दुरिहै = छिपेगी । जोति = ज्योति, दीप्ति । नाह = नाथ,
नायक । सुभाव ही की = स्वाभाविक । भौंर-भीर फारे खाति है = भौरों की
भीड़ फाड़े खाती है, भौंरे घेरे रहते हैं । सूरति की = सौंदर्यवाली । बिसूरति
हौं = मैं सोच रही हूँ । कुच = स्तन । भार = बोझ । लंक = कमर, कटि ।
भावार्थ—देह की स्वाभाविक दीप्ति से जब रात दिन की भाँति प्रकाश-
युक्त हो जाती है तब फिर यौवन की द्युति उत्पन्न होने पर और भूषण एवम्
वस्त्रों से सुसज्जित हो जाने पर तेरी दीप्ति कैसे छिपाए छिपेगी ? जब शरीर
की स्वाभाविक सुगंध ही से भौंरों की भीड़ तुझे घेरे रहती है तब नायक की
सुगंध लगने से न जाने क्या दशा होगी ? मैं तो तेरी सुंदर मूर्ति देखकर
(उसके ऊपर पड़नेवाले झंझटों का ध्यान करके ) सोच कर रही हूँ और तू
निश्चिन्त होकर नायक को अपनी आँखों से देखने के लिए लालायित हो रही
है (नायक को देखने पर तेरी जो दशा होगी उसकी कल्पना से ही मैं दुखी
हो रही हूँ और तू उसी के लिए प्रयत्नशील है ) । अभी केशों के बोझ से तो
तेरी कमर लचक जाती है, जब कुचों का भार होगा तब न जाने तू कैसे
चल सकेगी ?
सूचना—(१) केशवदास ने इसे 'कविप्रिया' में अभूतोपमा के उदाहरण
में दिया है । (२) 'सुबास', 'भौंर' आदि की बात लाने से 'मालिन' जान
पड़ती है।
मालिन को वचन श्रीकृष्ण सों, यथा—(कवित्त)
(४१५) घेरौ जिनि मोहि घर जान देहु घनस्याम,
घरिक में लागी डर देखिबो क्यों द्वामिनी ।
होइ कोऊ ऐसी वैसी आवै इत उत ह्वैकै,
वह बृषभानजू की बेटी गजगामिनी ।
आदित को आयो अंत आवौ बलि बलि जाउँ,
आवती हैं वेऊ बनी, आई बनि जामिनी ।


१३—सुभाव-सुदेहु, सुबास । लंक-कांट ।