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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 286 में से

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पृष्ठ 222

द्वादश प्रभाव २२७
परोसिन को वचन कृष्ण सों, यथा—( सवैया )
(४२३) हाँसी में बातक वासों कही हँसि वेहूँ कही सु हितै करि लेख्यो ।
आँखें मिली न मिली सखियाँ मिलबोई सु केसव क्यों अवरेख्यो ।
चिच्याइ मरै चुप साधै कि चातक स्वाति समै ही स्रवै सु बिसेख्यो ।
आजुहीं क्यों वह आवै यहाँ जिनि आगि लगैं हूँ न आँगन देख्यो ।१२।
शब्दार्थ—हाँसी में = हँसी में, झूठमूठ । बातक = एक बात (मेरे
यहाँ क्यों आने लगीं आदि) । वासों = उससे (नायिका से) । सु = वह
बातचीत । हितै करि लेख्यो = आपने अपने अनुकूल समझ लिया । आँखें
मिली न = आँखें चार नहीं हुईं । अवरेख्यो = निश्चित कर लिया । चिच्याइ
मरै = चिल्लाकर मरता रहे । चुप साधै कि = अथवा चुप होकर रहे । स्रवै=
पानी बरसाता है । सु = वह (बादल) । बिसेख्यो = विशेष रूप से, अत्यधिक ।
भावार्थ—(पड़ोसिन और नायिका को किसी दिन बातचीत करते हुए
नायक ने देखा । पड़ोसिन से नायिका को न आने का उलाहना दिया और
नायिका ने भी नायक की ओर देखते हुए हँसी में ही उलाहने का उत्तर देते
हुए आने की बात कही । नायक नायिका से मिलने के लिए उसी दिन पड़ो-
सिन के यहाँ आया है इस पर पड़ोसिन कह रही है) वाह आप भी अच्छे
निकले । उससे हँसी में मैंने एक बात कही और उसने भी हँसी में मुझे कुछ
उत्तर दे दिया, इधर आपने उसे ही अपनी घात की बात जान लिया । जब
आपसे न आँख मिली और न सखियाँ ही मिलने के लिए गईं तब आपने
मेरे यहाँ उससे भेंट होने का निश्चय कैसे कर लिया ? भला वह भलीमानस
आज मेरे यहाँ क्यों आने लगी, वह तो ऐसी है कि जब घर में आग लगी
थी तब भी आँगन झाँकने नहीं गई । (आप चातक की ठान क्यों नहीं
ठानते, क्योंकि ) चातक या तो चिचियाता हुआ मरता रहता है या चुप्पी ही
साध लेता है । बादल तो स्वातीं नक्षत्र में ही उसके ऊपर ध्यान देकर विशेष
जल गिराता है (ढारस रखिए, कभी न कभी आप पर भी उसकी कृपादृष्टि
हो ही जायगी) ।
मालिन को वचन राधिका सों, यथा—(कवित्त)
(४२४) दुरिहै क्यों भूषन बसन दुति जोबन की,
देह ही की ज्योति होति द्योस ऐसी राति है ।
नाह को सुबास लागेँ द्वै है कैसी केसव,
सुभाव हो की बास भौर-भीर फारे खाति है ।
१२—बातक-बात वै । वेहूँ-वाहू । हितै-हित्वै । क्यों-कै । मरै-मरो ।
साधै-साधो । स्रवै-सवै । आवै०-आवति हपाँ । जिनि-जिहि ।