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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 286 में से

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पृष्ठ 224

द्वादश प्रभाव २२६
काम के डरनि तुम कुंज गह्यो केसोदास ।
भौरन के भय भौन गह्यो उनि भामिनी ।१४।
शब्दार्थ--घेरौ जनि = रोकों मत । घनस्याम = श्रीकृष्ण; बादल ।
-घरिक में = एक घड़ी में । देखिबी = देखोगे । दामिनी=बिजली । लागी उर०=
बिजली की भाँति उसे हृदय से लगी देखोगे । ऐसी वैसी = साधारण । इत
उत ह्वैकै = इधर उधर से । आदित = ( आदित्य ) सूर्य । बनि=सजकर ।
बनी = श्रृंगार किए हुए । जामिनी = रात्रि । काम = कामोद्दीपन । भामिनी=
मन को भाने वाली, प्यारी नायिका ।
भावार्थ-हे कृष्ण, आपने काम के भय से ( कारण ) कुंज में प्रवेश
किया और भौरों के भय से वे घर में बैठी हैं। अब सूर्यास्त का समय हो रहा
है (वैराग्य-वेश त्यागिए ) शीघ्र सजकर प्रस्तुत हो जाइए, मैं बलिहारी जाती
हूँ । रात्रि आ ही गई, वे भी शृंगार किए हुए आ रही हैं ( वे पद्मिनी और
कमलबदनी हैं, उन्हें सुगंध-लोलुप भौंरे दिन में घेरे रहते हैं ) । यदि कोई
साधारण घराने की लड़की होती तो इधर उधर से ( किसी प्रकार ) आ ही
जाती, पर एक तो वे वृषभानु की पुत्री हैं ( बड़े घराने की हैं ) दूसरे गज-
गामिनी हैं ( धीरे धीरे चलती हैं ) । हे घनश्याम, मुझे मत रोकिए (नायिका
के घर जाने दीजिए ) घड़ी भर में उन्हें आप दामिनी की भाँति अपने हृदय
से लगी देखेंगे ।
सूचना-( १ ) नायक दुखी होकर जंगल में चला गया है ।
( २ ) सुवास की चर्चा करने से मालिन है ।
बरइनि को वचन कृष्ण सों, यथा-( कबित्त )
(४२६) मैन ऐसो मन मृदु मृदुल मृनालिका के
सूत ऐसी सुरधुनि मनहि हरति हैं।
दारथो कैसे बीज दाँत, पान से करुन ओठ,
केसोदास देखे दृग आनंद भरति हैं।
एरी मेरी तेरी मोहिं भावति भलाई तातें,
बूझति हौं तोहि और बूझत डरति हैं।
१४-देखिबी ज्यों-लागि लीजो, देखि लीजो। ह्वैकै-होइ, ह्वै सो । वह-
वेऊ, वे तौ । बलि बलि-अघनन, बन बलि । आई०-ओर आई, आई अरु ।
काम कें०-जैसे तुम काम के डरनि कुंजभौन गह्यो केसोराइ । के भय०-भयनि
भवन गह्यो, उन भौन गह्यो । उनि-उहि ।