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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 286 में से

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पृष्ठ 221

पर पैर रखने"
Wait! Is it "पलँग" or "पलंग"?
In line 25: "पलँग" (with an anusvara over ल, but is it लँ or लं?)
Wait, look at line 25: "पलँग को स्पर्श किया था ( पैर रखा था ) । ( और पलँग पर पैर रखने"
Look at "पलँग": it has an anusvara above 'ल'. It's "पलँग" or "पलंग"? Just a dot (anusvara). "पलंग".

Line 26:
"पर भी ) रति ( प्रीति, घुंघची ) को हटाकर तुमने उनकी प्रीति तोलनी"
Notice spacing around parentheses: "पर भी )", "( प्रीति, घुंघची )".

Line 27:
"आरंभ की । कसमें खाने पर अपने मुँह को उनके सामने किया । ऐसा"

Line 28:
"क्यों ? तुममें अब तक तो ऐसी चालढाल नहीं थी, भला रात में पान खिलाते"

Line 29:
"समय ( उनसे ) चिढ़ क्यों रही थीं ?"

Line 30:
"सूचना—सरदार कवि ने यह माना है कि पड़ोसिन ने स्वयम् आहट"

Line 31:
"नहीं पाई है । नायक ही उससे कह गया है । धाय, सखी आदि की अपेक्षा"

Line 32:
"पड़ोसिन से कहना नायिका को उलाहना देने के लिए अधिक संभव