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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 286 में से

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पृष्ठ 218

२२२ रसिकप्रिया
भावार्थ—(धाय की उक्ति कृष्ण प्रति) आज मैं जो नायिका ले आई हूँ,
उसकी छोटी और मनमोहनी वय है, बड़े नेत्र और लंबे केश हैं, पार्वती की
भांति गोरी है, शंकर की साली की भांति भोली है, साँचे में ढली हुई, पतली
और सुडौल कमर है। प्रत्येक अंग खराद पर चढ़ाकर खरादा हुआ (सुडौल)
है, यह सुगंध से सुवासित है, शरीर अमृत से सिक्त है। यह देवलोक से अव-
तीर्णा (अप्सरा सी) या समुद्र से निकाली हुई (लक्ष्मी) सी सुंदर है आज
इसीसे हँसे खेलें और बोलें चालें मैं कल काम की कुमारी सी दूसरी नायिका
ले आऊँगी।
सूचना—(१) यह छंद 'कविप्रिया' में विक्रियोपमा के उदाहरण में
दिया गया है, पर वहाँ पूर्वार्द्ध इस प्रकार है—
केसौदास कुंदन के कोस तें प्रकासमान,
चिंतामनि ओपनी सों ओपिकै उतारी सी।
इंदु के उदोत तें उकीरि ऐसो काढी, सब
सारस सरस सोभा सार तें निकारी सी।
(२) 'कुमारी' शब्द कहने से 'धाय' की उक्ति मानी जायगी।
जनी को बचन राधिका सों, यथा—(कबित्त)
(४१६) सोभा को सघन बन मेरो घनस्याम नित,
नई नई रुचि तन हेरत हिराइयै।
केसौदास सकल सुबास को निवास, करि
बिबिध बिलास हास, त्रास बिसराइयै।
ऊँख-रस केतक महूख-रस मीठो है,
पियूखहू की पैली धाँ है जाकों नियराइयै।
चोरी चोरौ नैननि चुराएँ सुख कौन जौ लौं,
पिय-मन माहि मन मेलि न चराइयै।५।
शब्दार्थ—रुचि = शोभा। हिराइ = खो जाता है, मन मुग्ध हो जाता
है। केतक = कितना (मीठा) है। महूख = (मधु) शहद। पैली = परली,
उस पार, पराकाष्ठा। धाँ ओर।
भावार्थ—(दासी का वचन नायिका प्रति) मेरे घनश्याम तो शोभा के
घने वन हैं, नित्य ही उनके शरीर की नई नई शोभा देखकर मन मुग्ध हो जाता
है। उनका शरीर सब प्रकार की सुगंध का घर है। उनके द्वारा अनेक प्रकार
के हासों का विलास होने से त्रास (विषाद) भूल जाया जाता है। ऊख का
रस कितना मीठा है, मधु में भी कितना मीठापन है। उनके निकट जाने से तो
५—जनी के०-प्रिया प्रति जनी को बचन। बन-घन। महूख-मयूख।
धाँ है-घातो।