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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 286 में से

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पृष्ठ 217

द्वादश प्रभाव २२१
हौं सिखऊँ सुखदै सिख तोहि तें भौंह चढ़ाइ कै डीठि अनैठी।
को न लड़ैती सरूप न काहितुहीं कछु जाति अकासहि ऐंठी।३।
शब्दार्थ—मिस=बहाने से। घर ही=घर में डाल रखेगी, बाहर न
निकलने देगी। सुखदै=हितकारी। अनैठी=अनिष्ट की, तनेनी की। लड़ैती=
दुलारी। सरूप=सुंदर।
भावार्थ=(धात्री की उक्ति नायिका प्रति) तू शतरंज खेलने का बहाना
करके रातदिन मोहन के साथ बैठी रहती है। यदि कहीं तेरी माता सुन लेगी
तो फिर घर में डाल रखेगी (बाहर फटकने भी न देगी)। मैं तो तुझे हितकर
शिक्षा देती हूँ और तू उलटे भौंहें चढ़ाकर मेरे ही ऊपर आँखें तनेनी कर रही
है। कौन लाड़-प्यार से पली दुलारी लड़की नहीं है, कौन रूपवती नहीं है,
पर तू ही कुछ ऐंठकर आकाश में चढ़ी जा रही है (सभी लाड़िली और सुंदर
होती हैं, पर ऐसे ऐंठते तो किसी को न देखा)।
सूचना—'लड़ैती' कहने से यह धाय की उक्ति मानी जायगी।
धाइ कों वचन कृष्ण सों, यथा—(कवित्त)
(४१५) थोरी सी सुदेस बैस दीरघ नयन केस,
गौराजू सी गोरी भोरी भवजू की सारी सी।
साँचे की सी ढारी अति सूक्ष्म सुढार कटि,
केसौदास अंग अंग भाँइकै उतारी सी।
सोंधे कैसी सोंधी, देह सुधा सों सुधारी पाइ
धारी देवलोक तें कि सिंधु तें उधारी सी।
आजु यासों हँसि खेलि बोलि चालि लेहु लाल,
कालि ऐसी ग्वारि लाऊँ काम की कुमारी सी।४।
शब्दार्थ—थोरी=छोटी। सुदेस = बढ़िया। बैस = (वयस्) उम्र।
दीरघ = (दीर्घ) विशाल, लंबे। गौरा=पार्वती। भोरी=भोली-भाली।
भव = महादेव। सारी=पत्नी की छोटी वहन, पार्वती की छोटी बहन। सुढार
=उत्तम, चढ़ाव-उतारवाली। भाँइकै=खराद पर चढ़ाकर खरादी हुई
सुडौल। सोधें० = सुगंध से सुवासित। पाइ धारी=आई, अवतीर्ण हुई।
उधारी = उद्धृत की हुई, निकाली हुई। ऐसी=ऐसी ही। ग्वारि ग्वालिनी।
३—महतारी०–जननी तेरी राखिहै। सिखऊं–सिखवों। सुखदै०–सिख
दै सखि। भौंह०-दीठि। दीठि-भौंह। अनैठी–अमंठी, उमैठी। काहि-का पै।
४—बैस-वेष। गौराजू–गौरीजू, गोरजा। सुढार०–सुधारि कढ़ी। पाइ-
पांड। उधारी–उबारी। ग्वारि–बाल।