रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (५५)
सोनामक्खी शोधन ।
स्वर्णमाक्षिकचूर्णन्तु वस्त्रे बद्ध्वा विपाचयेत् ।
कालमारिषशालिञ्च क्वाथे दोलाविधानतः ।
तदधः पतितं शस्तमेवं शुद्ध्यति माक्षिकम् ॥ १७ ॥
सोनामक्खीको कूटकर एक वस्त्रमें पोटली बांधे इस पोटलीको
डोरेमें बांध दोलायंत्रविधिसे कालमारिष ( मरसा शाक, कञ्चटशाक
जलके किनारे होनेवाली जलचौलाई ) के स्वरस और शालिशाक
( शांतिशाक ) के क्वाथमें पकावे पकते २ इस पोटलीमेंसे छनकर जो
बारीक २ सोनामक्खी पात्रमें गिर जायगी वही शुद्ध सोनामक्खी
जाननी, यह सब काममें लेने योग्य श्रेष्ठ है ॥ १७ ॥
माक्षिकस्य त्रयो भागा भागैकं सैन्धवस्य च ।
मातुलुङ्गद्रवैर्वाथ जम्बीरोत्थद्रवैः पचेत् ॥१८॥
लोहपात्रे पचेत्तावल्लोहदर्य्या च चालयेत् ।
भासवर्णमयो यावत्तावच्छुद्ध्यति माक्षिकम् ॥१९॥
सोनामक्खी तीन भाग और सेंधानमक एक भाग इन दोनोंको
पीसकर लोहेकी कडाहीमें डाल चूल्हेपर चढ़ावे नीचे अग्नि जलावे और
कड़ाहीमें बिजौरे नींबूका रस या जम्भीरी नींबूका रस डालता जावे
तथा कड़छीसे सोनामक्खीको चलाता रहे जब कड़ाही और सोना-
मक्खी लालवर्ण होजाय तो अग्नि बुझा दे, शीतल होनेपर सोनामक्खी-
को निकाल ले यह शुद्ध माक्षिक जानना ॥ १८ ॥ १९ ॥
माक्षिकभस्मविधि ।
माक्षिकस्य चतुर्थांशं गन्धं दत्त्वा विमर्दयेत् ।
उरुबूकस्य तैलेन ततः कुर्य्याच्च चक्रिकाम् ॥२०॥
शरावसंपुटे कृत्वा पुटेद्गजपुटेन तु ।
सिन्दूराभं भवेद्भस्म माक्षिकस्य न संशयः ॥ २१ ॥