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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

( ५४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
देवे तो विमल ( रूपामक्खी ) और सोनामक्खी शुद्ध होजाते हैं
( कोई इसीको विमलभस्म मानते हैं ) ॥ २१०-२१२ ॥
जम्बीरस्य रसैः स्विन्ने मेषशृङ्गीरसैस्तथा ।
रम्भातोयेन वा पाच्यं घस्रं विमलशुद्धये ॥ १३ ॥
अन्यप्रकारसे शोधन-जम्बीरी नींबूके रसमें और मेढासिंगीके रसमें
एवं केलाकंदके रसमें दोलायंत्रद्वारा एक दिन स्वेदन करे तो विमल
( रूपामक्खी ) शुद्ध होजाता है ॥ १३ ॥
सोनामक्खीके नाम ।
माक्षिके धातुमाक्षीकं तप्तस्तापिसमुद्भवम् ।
गारुडो माक्षिकः पक्षी बृहद्वर्ण इति स्मृतः ॥ १४ ॥
धातुमाक्षिक, तप्त, तापिसमुद्भव, गारुड, माक्षिक, पक्षी और
बृहद्वर्ण यह सोनामक्खीके नाम हैं ॥ १४ ॥
उत्तम सुवर्णमक्खी ।
भंगे सुवर्णसंकाशो मनाक्कृष्णच्छविर्बहिः ।
बृहद्वर्ण इति ख्यातो माक्षिकः श्रेष्ठ उच्यते ॥ १५ ॥
जो सोनामक्खी तोड़नेसे भीतरसे सुवर्णके समान वर्णवाली हो
और ऊपरसे किंचित् कृष्णवर्ण हो उस सोनामक्खीको बृहद्वर्ण
कहते हैं, यह माक्षिक औषधिकर्ममें श्रेष्ठ कही है ॥ १५ ॥
अशुद्ध सोनामक्खीके दोष ।
मंदाग्निं बलहानिं च व्रणं विष्टम्भगात्ररुक् ।
कुरुते माक्षिको मृत्युमशुद्धो नात्र संशयः ॥ १६ ॥
बिना शुद्ध सोनामक्खी मंदाग्निकारक, बलनाशक, व्रणकारक,
विष्टम्भ ( कबजी ) करनेवाली और अंगोंमें पीड़ा करनेवाली है एवं
मृत्युको भी करनेवाली है इसमें सन्देह नहीं ॥ १६ ॥