रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ५१ )
खपरियेको लाल और पीले वर्णके फूलोंके रसमें पीसकर भावना
देवे, अथवा मनुष्यके मूत्रमें, गोमूत्रमें और सेंधानमक डाली हुई जवोंकी
कांजीमें डोलायंत्रद्वारा सात २ दिन अथवा तीन २ दिन पकावे ( या
इनमेंसे किसी एकमें ७ दिन दोलायंत्रमें पकावे ) फिर निकालकर
गर्म पानीसे धो डाले तो खपरिया शुद्ध होजाता है ॥ २०० ॥
खर्परः परिसन्तप्तः सप्तवारान्निमज्जितः ।
निम्बुबीजरसे चान्तर्निर्मलत्वमवाप्नुयात् ॥ १ ॥
खपरियेको कोयलोंकी अग्निमें तपा तपा कर बिजौरे नींबूके रसमें
सात वार बुझावे तो खपरिया शुद्ध होजाता है ॥ १ ॥
खपरियामारण ।
खर्परं पारदेनैव वालुकायन्त्रगं पचेत् ।
चूर्णयित्वा दिनं यावच्छोभनं भस्म जायते ॥ २ ॥
शुद्ध खपरियाको अग्निपर गरम कर उसमें पारा मिला खरलमें डाल
खूब घोटे फिर शीशीमें डाल कपड़मिट्टी कर सुखाले. इस शीशीको
वालुकायन्त्रमें रख आठ प्रहर ( या १२ प्रहर ) की अग्नि दे, शीतल
होनेपर निकाल ले तो उत्तम भस्म होजायगी ॥ २ ॥
खर्परं लोहपात्रस्थं चूल्ह्यां दत्त्वा विपाचयेत् ।
गलिते सैन्धवं चूर्णं दत्त्वा दत्त्वा विमर्दयेत् ॥
भूयः पलाशदण्डेन यावद्भस्मीभवेत्तु तत् ॥ ३ ॥
खपरियेको लोहपात्र ( कड़ाही ) में रख चूल्हेपर चढ़ावे नीचे
बेरीकी लकडीकी अग्नि जलावे, जब खपरिया गल जावे तो उसमें
सैन्धव नमकका चूर्ण बार २ डालकर पलाशके डंडेसे तबतक रगड़ता
रहे जबतक खर्परकी भस्म न होजावे ॥ ३ ॥
खपरियेके गुण ।
नेत्ररोगहरः क्लेदी क्षयहा खर्परो गुरुः ॥ ४ ॥