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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

( ५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
दोलायन्त्रे दिनं पाच्या यामं छागस्य मूत्रके ।
क्षालयेदारनालेन सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ १९७ ॥
जयंतीका रस या भांगरेका रस अथवा लाल फूलके अगस्तियेका
रस लेकर उसमें दोलायंत्रकी विधिसे एक दिन स्वेदन करे । अथवा
बकरेके मूत्रमें दोलायन्त्रकी विधिसे एक प्रहर पकावे फिर निकालकर
कांजीसे धो डाले तो मनासिल शुद्ध होजाता है, इसका सब रोगोंमें
प्रयोग करना चाहिये ॥ १९७ ॥
मातुलुङ्गरसैः पिष्टा जयानीरैर्मनःशिला ।
शृङ्गवेररसैर्वापि विशुध्यति मनःशिला ।
अगस्त्यपत्रतोयेन भाविता सप्तवासरम् ॥ १९८ ॥
मनासिलको बिजौरेके रसमें और जयंतीके रसमें ( तीन २ दिन )
घोटता रहे । अथवा अदरखके रसमें ( सात दिन ) घोटे तो मनशिल
शुद्ध होजाता है. अथवा अगस्त्यके फूलोंके रसमें सात भावना देवे तो
मनशिल शुद्ध होता है ॥ १९८ ॥
मनशिलके गुण ।
कटुः स्निग्धा शिला तिक्ता कफघ्नी लेखनी सरा ।
भूतावेशभयं हन्ति कासश्वासहरा शुभा ॥ १९९ ॥
शुद्ध मनशिल--चरपरा, चिकना और कडवा है एवं कफनाशक,
लेखन, दस्तावर, भूतावेशके भयको दूर करनेवाला, खांसीनाशक,
श्वासरोगको हरनेवाला और शुभ है ॥ १९९ ॥
खपरिया शोधनविधि ।
पुष्पाणां रक्तपीतानां रसैः पिष्ट्वा च भावयेत् ।
नरमूत्रैश्च गोमूत्रैर्वाम्लैश्च ससैन्धवैः ॥
सप्ताहं त्रिदिनं वापि पश्चाच्छुद्ध्यति खर्परः ॥२००॥