रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
बदरीपल्लवोत्थेन कल्केन लेपयेद्भिषक् ।
अरुणाभमधःपात्रं तावज्ज्वाला प्रदीयते ॥ १८९ ॥
स्वाङ्गशीतं समुद्धृत्य माणिक्याभं भवेद्ध्रुवम् ।
तद्रक्तिद्वितयं खादेद्धृतभ्रामरमर्द्दितम् ॥ १९० ॥
संपूज्य देवदेवेशं कुष्ठरोगाद्विमुच्यते ।
स्फुटितं गलितं यच्च वातरक्तं भगन्दरम् ॥ १९१ ॥
नाडीव्रणं व्रणं दुष्टमुपदंशं विचर्चिकाम् ।
नासाऽऽस्यसम्भवान् रोगान् क्षतान् हन्ति सुदारुणान्
पुण्डरीकञ्च चर्माख्यं विस्फोटं मण्डलं तथा ॥ १९२॥
उत्तम वर्की हरिताल लेकर उसको पेठेके रसकी भावना देकर
सुखाले फिर भावना देवे फिर सुखाले ऐसे ७ भावना पेठेके रसकी,
सात या तीन भावना दहीकी और सात या तीन भावना कांजी या
नीम्बूके रसकी देवे प्रत्येक भावना देकर सुखाता जावे । फिर सुखाकर
चावलोंकी बराबर छोटे छोटे टुकड़े कर दो शरावोंमें रख बेरीके
पत्रोंके कल्कसे सन्धी लेप करे ( ऊपर एक वस्त्र और गाजनी मिट्टीका
लेप करे ) फिर इसके नीचे बेरीकी लकड़ीकी आंच देवे जब नीचेका
शराव अग्निके तापसे लाल होजाय तो आग निकालदे स्वांगशीतल
होनेपर माणिकके समान बनी हुई हरितालको निकाल ले । फिर
महादेवका पूजनकर इस माणिक रसको १ रत्ती या २ रत्ती ले घी
और शहदमें मिलाकर खावे तो कुष्ठरोग दूर होता है एवं फूटा हुआ
कुष्ठ, गलितकुष्ठ, वातरक्त, भगंदर, नाड़ीव्रण, व्रण, दुष्ट उपदंश, विच-
र्चिका, नासारोग, मुखरोग, दारुण क्षत, पुण्डरीक कुष्ठ, चर्मदल,
विस्फोटिक और मण्डलकुष्ठ यह सब दूर होते हैं । शरावमें सम्पुट
करते समय अभ्रकके पत्रोंमें हरिताल बंद करना चाहिये॥१८७-१९२
इति माणिकरस विधि ।