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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 584 में से

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पृष्ठ 73

भाषाटीकासहित । ( ४७ )
इस संपुटको वालुकायंत्रमें रख १२ प्रहर अग्नि दे सांगशीतल होनेपर
निकालकर चूर्ण करले । इसकी एक रत्ती मात्रा खानेसे कुष्ठ और
श्लीपद दूर होते हैं ॥ १८२-१८४ ॥
मरे हुए हरतालकी परीक्षा ।
तालं मृतं तदा ज्ञेयं वह्निस्थं धूमवर्जितम् ।
सधूमं न मृतं प्राहुर्वृद्धवैद्या इति स्थितिः ॥१८५॥
हरिताल भस्मको धधकते हुए अंगारेपर डालना, यदि उसमेंसे
धूम न निकले तो मरा हुआ जानो, नहीं तो कच्चा रहा, ऐसा वृद्ध
वैद्य कहते हैं ॥ १८५ ॥
हरितालके गुण ।
हरितालं कटु स्निग्धं कषायञ्च विसर्पनुत् ।
तालकं हरते रोगान् कुष्ठमृत्युज्वरादिकान् ॥
संशुद्धं कान्तिवीर्यौजः कुरुते मृत्युनाशनम् ॥१८६॥
हरिताल-कटु स्निग्ध और कषैली है । एवं विसर्पनाशक, संपूर्ण
रोगोंको हरनेवाली, कुष्ठ, ज्वर और मृत्युको नाश करनेवाली है ।
भले प्रकार शोधन मारण की हुई हरिताल कांतिजनक, वीर्यप्रद,
ओजवर्धक और मृत्युको भी नष्ट करती है ॥ १८६° ॥
माणिक रस ।
तालकं वंशपत्राख्यं कूष्माण्डसलिले क्षिपेत् ।
सप्तधा वा त्रिधा वापि दध्ना चाम्लेन वा पुनः१८७॥
शोषयित्वा पुनः शुष्कं चूर्णयेत्तण्डुलाकृति ।
ततः शरावके पात्रे स्थापयेत्कुशलो भिषक्॥१८८॥