रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
वज्रमारण ।
त्रिवर्षारूढकार्पासमूलमादाय पेषयेत् ।
त्रिवर्षनागवल्ल्यास्तु निजद्रावैः प्रपेषयेत् ॥१२९॥
तद्गोलके क्षिपेद्वज्रं रुद्धा गजपुटे पचेत् ।
एवं सप्तपुटेनैव म्रियते कुलिशं ध्रुवम् ॥ १३० ॥
तीन वर्षसे एक स्थानमें उत्पन्न हुई कपासकी जड़को लेकर तीन
वर्षसे उत्पन्न हुई नागरवेलके रसमें खरल कर गोला बनावे उसमें
हीरेको रखकर संपुट करे इस संपुटको गजपुटमें फूंक दे ऐसे ७ पुट
देनेसे हीरेकी भस्म होजाती है ॥ १२९ ॥ १३० ॥
कांस्यपात्रे तु भेकस्य मूत्रे वज्रं तु निक्षिपेत् ।
त्रिःसप्तकृत्वः सन्तप्तं वज्रमेवं मृतं भवेत् ॥१३१॥
अन्य प्रकार—कांसीके पात्रमें मेढकका मूत्र डालकर उसमें हीरा तपा
तपाकर २१ वार बुझावे तो हीरेकी भस्म होजाती है ॥ १३१ ॥
त्रिःसप्तकृत्वः सन्तप्तं खरमूत्रेण सेचयेत् ।
मुद्गरैस्तालकं पिष्ट्वा तद्गोले कुलिशं क्षिपेत् ॥१३२॥
प्रध्मातं वाजिमूत्रेण सिक्तं पूर्वक्रमेण तु ।
भस्मीभवति तद्वज्रं वज्रवत्कुरुते तनुम् ॥१३३॥
आयुष्यं सौख्यजननं बलरूपप्रदं तथा ।
रोगघ्नं मृत्युहरणं वज्रभस्म भवत्यलम् ॥ १३४ ॥
अन्य प्रकार—हीरेको २१वार अग्निमें तपा तपा कर गधेके मूत्रसे सेचन
करे । फिर हरितालको पीसकर इस हरितालके गोलेमें हीरेका संपुट
कर कोयलोंकी अग्निमें धौंकनीसे धमाकर लाल बनादे फिर इसे घोडेके
मूत्रसे सेचन करे ऐसे २१ वार धमा २ कर घोड़ेके मूत्रसे सींचे
( बुझावे ) तो हीरेकी भस्म हो जाती है । इस हीरेकी भस्मके सेवनसे