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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

भाषाटीकासहित । ( ३३ )
आमोन्मन्थनशोधनो विषहरः सूतेन्द्रवीर्यप्रदः,
गौरीपुष्पभवस्तथाकृमिहरःस्वर्णाधिकं वीर्यकृत् १२५॥
गंधक-अत्यंत रसायन, मधुर, पाकमें कडुआ और गरम है तथा
खाज, कुष्ठ, विसर्प और मदको नष्ट करता है । एवं अग्निको दीप्त
करनेवाला, पाचन, आमदोषनाशक, मलशोधक, विषनाशक, पारेको
बलके देनेवाला, पार्वतीके पुष्पसे उत्पन्न हुआ व कृमियोंको हरने-
वाला और सुवर्णके वीर्यको बढानेवाला या सुवर्णसे भी अधिक वीर्य
देनेवाला होता है । यह शुद्ध गंधकके गुण हैं ॥ १२५ ॥
वज्र ( हीरा ) शोधनप्रकरणम् ।
अशुद्ध हीरेके दोष ।
पार्श्वपीडां पाण्डुरोगं हृल्लासं दाहसन्ततिम् ।
रोगानीकं गुरुत्वञ्च धत्ते वज्रमशोधितम् ॥१२६ ॥
अशुद्ध हीरा-पार्श्वपीडा, पांडुरोग, हृल्लास, अत्यंतदाह, शरीरमें
अनेक रोगों और भारीपन को उत्पन्न करता है ॥ १२६ ॥
वज्रशोधन ।
व्याघ्रीकन्दगतं वज्रं डोलायन्त्रे विपाचितम् ।
सप्ताहं कोद्रवक्वाथे कौलत्थे विमलं भवेत् ॥१२७॥
व्याघ्रीकंदमें हीरेको रखकर कपड़ेमें बांध डोलायंत्रद्वारा कोदोके
और कुलथीके क्वाथमें सात दिन पकावे तो हीरा शुद्ध हो जाता है॥१२७
व्याघ्रीकन्दगतं वज्रं डोलायन्त्रे विपाचितम् ।
अहोरात्रात्समुद्धृत्य हयमूत्रेण सेचयेत् ।
वज्रीक्षीरेण वा सिञ्चेत्कुलिशं विमलं भवेत्॥१२८॥
अथवा-व्याघ्रीकन्द ( कटेलीकी जड़के पिंड ) में हीरेको रखकर एक
दिन रात डोलायंत्र द्वारा कोद्रव या कुलथीके क्वाथमें पकाकर घोडेके
मूत्रसे अथवा थोहरके दूधसे सेचन करे तो हीरा शुद्ध होजाता है॥ १२८॥