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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 584 में से

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पृष्ठ 581

भाषाटीकासहित । ( ५५५ )
चव्यं कुष्ठं दुरालंभा भार्गी रास्ना च रेणुका ।
सर्षपा राजिका चैव सिंधुं सर्जरसं तथा ॥ १४ ॥
समभागं विचूर्ण्यैतद्भावयेत् शिग्रुजे द्रवे ।
शुष्कं विचूर्ण्य तच्चूर्णमातुराङ्गे च मर्दयेत् ॥
ज्वरमष्टविधं हन्यात्सन्निपातं च दारुणम् ॥ १५ ॥
चिरायता, कटुकी, त्रिकुटा, त्रिफला, देवदारु, फूलप्रियंगु, हींग,
मंजीठ, सौंफ, सोरा, अजमोद, अजवायन, कचूर, मुलेठी, कुलथी,
त्रायमाण, कायफल, अतीस, चव्य, कूठ, जवासा, भारंगी, रास्ना,
रेणुका, सरसों, राई, सेंधानमक, राल इन सबको सम भाग लेकर
सुहांजनेके रसमें भावना दे, सूखनेपर बारीक पीसकर ज्वरवालेके शरीर-
पर इस चूर्णको मर्दन करे तो आठ प्रकारके ज्वर और तेरह प्रकारके
सन्निपात दूर होते हैं ॥ १२-१५ ॥
तीव्रज्वरनाशक धूलन ।
हरिप्रियबलभद्रामाधवीशृङ्गवेरं कवचजलजवीरं
बालकं भद्रकन्दम्। दलरजसमभागं धूलनं यस्य
गात्रे शमयति ज्वरतीव्रं सर्वदाहं निहन्ति ॥ १६ ॥
अगरु, त्रायमाण, सौंफ, सोंठ, भोजपत्र, कमल, पोहकरमूल, नेत्र-
वाला, नागरमोथे और तेजपत्र इन सबका चूर्ण कर शरीरपर मलेनेसे
तीव्रज्वर और दाह दूर होती है ॥ १६ ॥
ज्वरनाशक धूप ।
पलोन्मितं निम्बपटोलपत्रं कुष्ठं वचागुग्गुलुसर्षपानाम् ।
हरीतकीसर्पिरितं च धूपं विनाशनं वै विषमज्वराणाम् १७
इति श्रीगोपालकृष्णसूरिविरचिते रसेन्द्रसारसंग्रहे
परिशिष्टभागः समाप्तः ।