रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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ज्वरनाशक नस्य ।
शुद्धतुत्थं पलैकं च भावयेज्जालिनीरसैः ।
सप्तविंशतिवारांश्च निम्बूनीरे तथैव च ॥ ९ ॥
शुष्कंनस्यं प्रदातव्यं सर्वज्वरविनाशनम् ।
यस्मिन्नासापुटे दत्तं ह्यर्द्धाङ्गज्वरनाशनम् ॥१०॥
शुद्ध तूतियेको कड़वी तोरीके रसमें सत्ताईस २७ बार भावना
देवे, फिर नींबूके रसमें २७ भावना देकर सुखा ले और पीसकर
रखे; इसकी नस्य देनेसे सब प्रकारके ज्वर दूर होते हैं। कौतुक
यह है जिस ओरकी नासापुटमें नस्य दे उसी ओरके आधे अंगका
ज्वर दूर होता है ॥ ९ ॥ १० ॥
अर्द्धाङ्गज्वरनाशक लेप ।
पौष्करं कट्फलं शुण्ठी मुस्तं जातीफलं समम् ।
शतपुष्पा शटी चैव छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥
कोष्णं कृत्वा ततश्चार्धेज्वराणां नाशनं परम् ॥११॥
पोहकरमूल, कायफल, सोंठ, नागरमोथा, जायफल, सौंफ और
कचूर इनको बकरीके दूधमें रगड़कर लेप करनेसे आधे अंगमें
होनेवाला ज्वर नष्ट होता है ॥ ११ ॥
सर्वज्वरनाशक धूलन ।
भूनिम्बकटुकाव्योषं त्रिफलामरदारु च ।
प्रियंगुहिंगुमंजिष्ठाः शतपुष्पा च कारवी ॥१२॥
अजमोदाजमानी च कचूरमधुकं तथा ।
कुलत्थं त्रायमाणा च कट्फलातिविषा तथा ॥१३॥