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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 566

( ५४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
औषधिके सेवन करनेसे मनुष्योंकी मृत्यु दूर हो जाती है उसी प्रकार
इस औषधिके सेवन करनेसे जरा और मृत्यु दूर होती है । इस चंद्रो-
दयको तन्त्रान्तरोंमें मकरध्वज कहते हैं ॥ ७०–७३ ॥
मकरध्वज रस ।
स्वर्णस्य भागौ वङ्गश्च मौक्तिकं कान्तलोहकम् ।
जातीकोषफले रूप्यं कांस्यकं रससिन्दुरम् ॥ ७४॥
प्रवालं कस्तूरीचन्द्रमभ्रकञ्चैकभागिकम् ।
स्वर्णसिन्दूरतो भागाश्चत्वारः कल्पयेद्बुधः ॥ ७५ ॥
नातः परतरः श्रेष्ठः सर्वरोगनिषूदनः ।
सर्वलोकहितार्थाय शिवेन परिकीर्तितः ॥ ७६ ॥
सोना २ भाग, वंग, मोती, कान्तलोह, जावित्री, जायफल, रूपा,
कांसा, रससिंदूर, मूंगा, कस्तूरी, कपूर और अभ्रक यह प्रत्येक
औषधि एक एक भाग और स्वर्णसिंदूर ४ भाग इन सब औषधियोंको
एकत्र जलमें पीसकर अच्छे प्रकारसे खरल करके यथामात्राकी
वटी बनाकर यथोचित अनुपानके साथ सेवन करे तो सब प्रकारके
रोग नष्ट होते हैं । यह मकरध्वज रस समस्त प्राणियोंके हितके लिये
महादेवने कहा है ॥ ७४–७६ ॥
वसन्ततिलक रस ।
हेम्नो भस्मकतोलकं घनयुगं लौहात्त्रयः पारदा-
च्चत्वारो नियतन्तु वङ्गयुगलञ्चैकीकृतं मर्दयेत् ।
मुक्ताविद्रुमयो रसेन समता गोक्षूरवासेक्षुणा,
सर्वं वन्यकरीषकेण सुदृढं तत्तत्पचेत्सप्तधा ॥
॥७७॥ कस्तूरीघनसारमर्दितरसः पश्चात्सुसिद्धो
भवेत्, कासश्वाससपित्तवातकफजित् पाण्डु-