रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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क्षयादीन्हरेत् । शूलादिग्रहणीं विषादिहरणो मेहां-
स्तथा विंशतिं, हृद्रोगादिहरो ज्वरादिशमनो वृष्यो
वयोवर्द्धनः ॥ श्रेष्ठः पुष्टिकरो वसन्ततिलको
मृत्युञ्जयेनोदितः ॥ ७८ ॥
सोनेकी भस्म १ तोला, अभ्रककी भस्म २ तोले, लोहेकी भस्म ३
तोले, रससिन्दूर ४ तोले, वंगभस्म २ तोले, मोतीभस्म ४ तोले और
मूंगाभस्म ४ तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गोखरू,
अडूसा और ईखके रसमें खरल करके अरने उपलोंकी अग्निसे पुट देवे ।
इस प्रकार गोखरूआदिके रसमें सात वार भावना देकर सात वार पुट देवे।
फिर कस्तूरी ४ तोले और कपूर ४ तोले मिलाकर यथोचित मात्राकी
गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करने खांसी, श्वास, वात,
पित्त, कफ, पाण्डुरोग, क्षय, शूल,संग्रहणी,अनेक प्रकारका विष, बीस
प्रकारके प्रमेह, हृद्रोग और ज्वर रोगादि समस्त नष्ट होते हैं । यह
औषधि वीर्य और आयुको बढ़ानेवाली है । यह अतीव पुष्टिकारक
वसन्ततिलक नामक रस स्वयं महादेवने कहा है ॥ ७७ ॥ ७८ ॥
वसन्तकुसुमाकर रस ।
द्विभागं हाटकं चन्द्रं त्रयो वङ्गाहिकान्तकाः ।
चतुर्भागं शुद्धमभ्रं प्रवालं मौक्तिकं तथा ॥७९॥
भावयेद्गव्यदुग्धेन भावनेक्षुरसेन च ।
वासालाक्षारसोदीच्यरम्भाकन्दप्रसूनकैः ॥ ८० ॥
शतपुत्रीरसेनैव मालत्याः कुंकुमोदकैः ।
पश्चान्मृगमदैर्भाव्यं सुगन्धिरससम्भवम् ॥ ८१ ॥
कुसुमाकरविख्यातो वसन्तपदपूर्वकः ।
गुञ्जाद्वयेन संसेव्यः सितामध्वाज्यसंयुतः ॥ ८२ ॥