रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ५३९ )
रसके द्वारा और घीक्वारके रसमें अच्छे प्रकारसे खूब खरल करके सुखा
लेवे । फिर उसको आतसी शीशीमें रख देवे और उसके ऊपर कपड़रौटी
करके सूर्यकी धूपमें सुखा देवे । फिर खड़िया मिट्टीसे उसके मुखको
बंद करके वालुकायंत्रमें तीन दिनतक पकावे । जब शीतल होजाय
नवीन पल्लवके समान लाल रंगके रससिंदूरको ग्रहण करलेवे । इस
प्रकार बनाया हुआ स्वर्णसिंदूर ४ तोले, कपूर ४ तोले, जायफल
४ तोले, पीपल ४ तोले, लौंग ४ तोले और कस्तूरी ४ मासे लेवे,
इन सबको एकत्र पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे, प्रतिदिन
एक गोली पानमें रखकर खाय । इस औषधिके भक्षण करनेसे मनुष्य
कामदेवसे उन्मत्त होकर सैकड़ों स्त्रियोंसे रमण करके उनके गर्वको
भञ्जन करता है । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् घृत, गाढ़ा दूध
( या रबड़ी ), कोमल मांस, नागरमोथा, पिष्टकपंदार्थ और अन्याय
आनन्दजनक पथ्य सेवन करे ॥ ६६-६९ ॥
रतिकाले रतान्ते वा सेवितोऽयं रसेश्वरः ।
मानहानिं करोत्येष प्रमादानां सुनिश्चितम् ॥ ७० ॥
कृत्रिमं स्थावरञ्चैव जङ्गमञ्चैव यद्विषम् ।
न विकाराय भवति साधकेन्द्रस्य वत्सरात् ॥७१॥
यथा मृत्युञ्जयोऽभ्यासान्मृत्युं जयति देहिनाम् ।
तथायं साधकेन्द्रस्य जरामरणनाशनः ॥ ७२ ॥
इन्द्रपुष्पं लवंगं स्यात्कार्पासकुसुमद्रवैः ।
तन्त्रान्तरे प्रसिद्धोऽयं मकरध्वजनामतः ॥ ७३ ॥
मैथुनके समय अथवा मैथुनके अंतमें इस औषधिके सेवन कर-
नेसे कामिनियोंके मानकी हानि होती है । इसको एक वर्षतक सेवन
करनेसे कृत्रिमविष, स्थावर और जंगमविष और किसी प्रकारका
विकार भी शरीरमें कुछ हानि नहीं कर सकता । जिस प्रकार मृत्युञ्जय