रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
शरीर हो जाता है । इस औषधिके सेवन करनेसे अपुत्रा स्त्री पुत्रवती
होती है । दुर्बल मनुष्य, क्षीण व्यक्ति, वृद्ध मनुष्य और वायुसे
दूषित वीर्यवाले मनुष्योंको ओज और तेजको बढ़ानेवाली है ।
स्त्रीगमनमें इच्छा बढ़ाती है । प्रौढ़ा स्त्रीके साथ प्रसंग करनेसे वृद्ध
मनुष्योंको भी कामदेवको बढ़ानेवाली है । नित्य आनन्द जनक और
अतिशय सुखको देनेवाली है । इस औषधिके अभ्याससे मनुष्य मृत्यु
पलित और सर्व रोगोंसे रहित हो जाता है । यह बृहत्पूर्णचन्द्ररस
राजाओंके योग्य तत्काल फलप्रद और सिद्धिदायक है ॥६०-६४ ॥
चन्द्रोदय रस ।
पलं मृदुस्वर्णदलं रसेन्द्रात्पलाष्टकं षोडश गन्ध-
कस्य । शोणैः सुकार्पासभवप्रसूनैः सर्वं विम-
र्द्याथ कुमारिकाद्भिः ॥ ६५ ॥ तत्काचकुम्भे
निहितं प्रगाढं मृत्कर्पटैस्तद्दिवसत्रयञ्च । पचेत्
क्रमाग्नौ सिकताख्ययन्त्रे ततो रजः पद्मराग-
रम्यम् ॥ ६६ ॥ संगृह्य चैतस्य पलञ्च सम्यक्
पलञ्च कर्पूररजस्तथैव । जातीफलं शोषणमिन्द्र-
पुष्पं कस्तूरिकाया इह शाण एकः ॥ ६७ ॥
चंद्रोदयोऽयं कथितोऽस्य वल्लो भुक्तोऽहिवल्लीदल-
मध्यवर्ती।मदोन्मदानां प्रमदाशतानां गर्वाधिकत्वं
श्लथयत्यकुण्ठात् ॥६८॥ घृतं घनीभूतमतीव दुग्धं
मृदूनि मांसानि च मुस्तकानि । माषाणि पिष्टानि
भवन्ति पथ्यान्यानन्ददायीन्यपराणि चात्र॥६९॥
कोमल सुवर्णके पत्र (वरक) ४ तोले, पारा ८ पल और गंधक १६
पल इन तीनों औषधियोंको एकत्र पीसकर लाल कपासके फूलोंके