रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ४९१ )
अथ अम्लपित्तरोगचिकित्सा ।
अम्लपित्तान्तक रस ।
मृतसूताभ्रलोहानां तुल्यां पथ्यां विमर्दयेत् ।
माषमात्रं लिहेत्क्षौद्रैरम्लपित्तप्रशान्तये ॥ १ ॥
रससिन्दूर या पारदभस्म, अभ्रकभस्म और लोहभस्म यह प्रत्येक
औषधि एक एक भाग और हरड़ ३ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको
एकत्र खरल करके एक एक मासे सहतके साथ खावे तो अम्लपित्त-
रोग नष्ट होता है । इसको अम्लपित्तान्तक रस कहते हैं ॥ १ ॥
लीलाविलास रस ।
रसो बलिव्र्योम रविश्च लौहं धात्र्यक्षनीरैस्त्रिदिनं विमर्द्य ।
तदल्पघृष्टं मृदुमार्कवेण संमर्दयेदस्य च वल्लयुग्मम् ॥२॥
हन्त्यम्लपित्तं मधुनावलीढं लीलाविलासो रसराज एषः।
छर्दिं सशूलं हृदयस्य दाहं निवारयेदेष न संशयोऽस्ति३
शुद्ध पारा, गंधक, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म और लोहभस्म यह सब
औषधि समान भाग लेकर आमलोंके और बहेड़ेके क्वाथमें तीन दिन-
तक भावना देवे । फिर कोमल भांगरेके रसमें दुबारा खरल करके
चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । सहतके साथ इन गोलियोंके
सेवन करनेसे अम्लपित, वमन, शूल और हृदयकी दाह दूर होती
है । इसको लीलाविलास रस कहते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥
पानीयभक्तवटिका ।
त्रिवृता मुस्तकं चैव त्रिफला त्र्यूषणन्तथा ।
प्रत्येकन्तु पलं भागं तदर्धौ रसगन्धकौ ॥ ४ ॥
लौहाभ्रकविडङ्गानां प्रत्येकं च पलद्वयम् ।
एतत्त्सकलमादाय चूर्णयित्वा विचक्षणः ॥ ५ ॥