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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 516

( ४९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
अथ शीतपित्तोदर्दकोष्ठाधिकारः ।
यमानीगुडसंमिश्रः सूतभस्मद्विवल्लभः ।
शीतपित्तं निहन्त्याशु कटुतैलविलेपनम् ॥ १ ॥
चार रत्ती रससिन्दूरको अजवायन और गुड़के साथ सेवन करे और
शरीरपर कड़वे तेलकी मालिश करे तो शीतपित्तरोग नष्ट होता है ॥ १ ॥
सिद्धार्थरजनीकल्कं प्रपुन्नाडतिलैः सह ।
कटुतैलेन संमिश्रमेतदुद्वर्त्तनं हितम् ॥ २ ॥
सरसों, हलदी, चकवड़ और तिल इन सबको एकत्र पीसकर कड़वे
तेलमें मिलाकर शरीरपर मर्दन करे तो शीतपित्तरोग नष्ट होते हैं ॥ २ ॥
दूर्वानिशायुतो लेपः कण्डूपामाविनाशनः ।
क्रिमिदद्रुहरश्चैव शीतपित्तहरः परः ॥ ३ ॥
दूबकी जड़ और हलदी इन दोनोंको एकत्र पीसकर प्रलेप करनेसे
कण्डू, पामा, क्रिमि, दद्रू और शीतपित्तरोग नष्ट होता है ॥ ३ ॥
कुष्ठोक्ताञ्च क्रियां कुर्यात्सर्वां युक्त्या चिकित्सकः ।
शीतपित्ते तथोदर्दे कोष्ठे चैव समासतः ॥ ४ ॥
इति रसेन्द्रसारसंग्रहे शीतपित्तोदर्दकोष्ठाधिकारः ।
जो चिकित्सा कुष्ठरोगकी कही है वही सब चिकित्सा युक्ति-
पूर्वक संक्षेपसे शीतपित्त, उदर्द और कोटरोगमें भी प्रयुक्त करनी
चाहिये ॥ ४ ॥
इति शीतपित्तोदर्दकोष्ठचिकित्सा समाप्त ।