रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३६३ )
धतूरेके बीज १ तोला, जलवेंत ( समुद्र फल ) के बीज १ तोला,
गोखुरू १ तोला, विधारेके बीज १ तोला, भांगके बीज १ तोला,
जावित्री १ तोला, जायफल १ तोला, कपूर १ तोला और सोनाभस्म
आधा तोला लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके पानोंके
रसमें खरल करके सीजे हुए चनेकी बराबर गोली बना लेवे । यह
औषधि चतुर्मुख रसके समान गुणकारक है । इसको महालक्ष्मी-
विलास रस कहते हैं ॥ ४५–४८ ॥
रोगैभसिंह ।
सूताह्वयो घनवरानलवेल्लभाङ्गी तिक्ताकटुत्रयविषैः
सवचैः समांशैः । रोगैभसिंह इति वातकफामयघ्नः
सान्द्रोऽयमल्पपटुतो विहितो द्विगुञ्जः ॥ ४९ ॥
रससिन्दूर २ भाग, पारा, नागरमोथा, हरड़, बहेड़ा, आमला,
चित्रककी जड़, वायविडंग, भारंगी, कुटकी, सोंठ, पीपल, मरिच, विष
और वच यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर दो दो रत्तीकी गोली
बना लेवे । इसके सेवन करनेसे कफवातज रोग नष्ट होते हैं, इस-
लिये इसको रोगैभसिंह कहते हैं ॥ ४९ ॥
श्रीखण्डवटी ।
एतैर्गुडप्रमृदितै रसवर्जितैः स्यात्,
श्रीखण्डनामगुटिका विहिता द्विगुञ्जा ।
शैत्याद्यजीर्णकफवातभवान् विकारान्,
हन्त्यार्द्रकेण नियुताप्यथ केवला वा ॥ ५० ॥
पूर्वोक्त रोगैभसिंह रसमें जो औषधि कही हैं उनमेंसे रससिन्दूरको
निकालकर उसके स्थानमें गुड़ डालकर दो २ रत्ती परिमाणकी गोली
बना लेवे । अदरखके रसके साथ अथवा अनुपानके विना इस औषधिके
सेवन करनेसे शीतता, अजीर्ण और कफवातज रोग नष्ट होते हैं ।
इसको श्रीखण्डवटी कहते हैं ॥ ५० ॥