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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 584 में से

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पृष्ठ 375

भाषाटीकासहित । ( ३४९ )
शुष्कमेतद्विचूर्ण्याथ विषञ्चास्याष्टमांशतः ।
टङ्कणं विषतुल्यांशं दत्त्वा जम्बीरजैर्द्रवैः ॥ २६ ॥
भावयेद्दिनमेकन्तु रसोऽयं वातकण्टकः ।
दातव्यो वातरोगेषु सन्निपाते विशेषतः ॥ २७ ॥
द्विगुञ्जामाईकद्रावैर्घृतैर्वा वातरोगिणे ।
निर्गुण्डीमूलचूर्णन्तु महिषाक्षञ्च गुग्गुलुम् ॥ २८ ॥
समांशं मर्दयेदाज्ये तद्वटी कर्षसंमिता ।
अनुयोज्य घृतैर्नित्यं स्निग्धमुष्णञ्च भोजयेत्॥२९॥
मण्डलं नाशयेत्सर्वं वातरोगे विशेषतः ।
सन्निपाते पिबेच्चानु तालमूलीकषायकम् ॥ ३० ॥
हीराभस्म १ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग, सोनाभस्म ३ भाग,
तांबाभस्म ४ भाग, तीक्ष्णलोहभस्म ५ भाग, मुण्डलोह ६ भाग और
काली मिरच ७ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके
अम्ल वर्गकी औषधियोंमें तीन दिन तक खरल करके फिर इसके
बराबर बराबर सज्जीखार, जवाखार, पांचों लवण मिलाकर सम्हालूके
रसमें तीन दिन तक भावना देवे । जब शुष्क हो जाये तब चूर्णका
आठवां भाग विष और विषकी बराबर सुहागा मिलाकर जम्भीरी
नींबूके रसमें एक दिन तक भावना देवे । इस औषधिका वातरोग और
सन्निपात रोगमें प्रयोग करे । इसको दो रत्ती परिमाण अदरखके रसके
साथ अथवा घृतके साथ वातरोगीको देवे । इसके सेवन करनेके
अन्तमें सम्हालूकी जड़का चूर्ण और गूगल समान भाग लेकर घृतमें
मर्दन करके घृतके साथ एक कर्ष परिमाण भक्षण करावे । इसपर
स्निग्ध और उष्ण पदार्थ पथ्य देवे । इसके सेवन करनेसे मण्डल-
रोग और सर्व प्रकारके वातरोग नष्ट होते हैं । सन्निपातरोगमें इस
औषधिका सेवन कराकर ऊपरसे मुसलीका क्वाथ पान करावे ! इसको
वातकण्टक रस कहते हैं ॥ २४-३० ॥