रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३४३ )
बहुदोषान्वितं वातं कामजं चित्तविभ्रमम् ।
पित्तकृतञ्च यद्दोषं दग्धञ्च दृष्टिमागतम् ॥
शस्यते सर्वरोगेषु सर्वापस्मारेकेषु च ॥ १९ ॥
इति अपस्माररोगचिकित्सा ।
पारा, हीरा, सोना, चांदी, मोती, हरिताल, गंधक, रससिन्दूर,
खपरिया, मैनशिल, अभ्रक, कान्तलोह, सिंग्रफ और सीसेकी भस्म यह
प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेकर सबको एकत्र पीसकर
मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । फिर पत्थरके पात्रमें डालकर ब्राह्मीके
रसमें, जयंतीके रसमें, सम्हालूके रसमें और पानोंके रसमें अलग २
सात सात भावना देकर सुखा लेवे । फिर इसको घोटकर गोलासा
बनाकर केलेकी जड़में रखकर एक दिन, दो दिन, तीन दिन अथवा
चार दिन पीछे निकालकर उसे रातमें ओस और दिनमें सूर्यकी धूपमें
रखे । पश्चात् इसको पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस
औषधिको प्रातःकाल सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ।
इससे अनेक दोषयुक्त वातरोग, कामजव्याधि, चित्तभ्रम, पित्तजव्याधि,
दग्धदृष्टि और सर्व प्रकारके अपस्मार रोग नष्ट होते हैं । इसको
पाषाणवज्र रस कहते हैं ॥ १३–१९ ॥
इति अपस्माररोगचिकित्सा ।
अथ वातव्याधिचिकित्सा ।
द्विगुणाख्य रस ।
गन्धकाद्विगुणं सूतं शुद्धं मृद्वग्निना क्षणम् ।
पक्त्वाऽवतार्य संचूर्ण्य तुल्याभयसमन्वितम् ॥ १ ॥
सप्तगुंजामितं खादेद्वर्द्धयेच्च दिने दिने ।
गुञ्जैकैकक्रमेणैव यावत्स्यादेकविंशतिः ॥ २ ॥