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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 584 में से

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पृष्ठ 370

( ३४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
क्षीराज्यशर्कराभिश्च शाल्यन्नं पथ्यमाचरेत् ।
कम्पवातप्रशान्त्यर्थं निर्वीते निवसेत्सदा ॥
द्विगुणाख्यरसो नाम त्रिपक्षात्कम्पवातजित् ॥ ३ ॥
गंधक १ भाग और पारा २ भाग इन दोनोंको एकत्र खरल करके
कज्जली बना लेवे, फिर थोड़ी देरतक मंद मंद अग्निसे पकाकर चूर्ण
कर लेवे, पश्चात् पारे और गंधक दोनोंके बराबर हरड़का चूर्ण मिला-
कर सात रत्ती परिमाण भक्षण करे । यह सात रत्तीकी पहिले दिनकी
मात्रा है । दूसरे दिन आठ रत्ती, तीसरे दिन नौ रत्ती इसी क्रमसे प्रति-
दिन एक एक रत्ती बढ़ाकर इसका सेवन करे । जब बढ़कर २१ रत्ती
परिमाण हो जाय तब फिर आगेको नहीं बढ़ावे । इस औषधिके सेवन
करनेके अंतमें दूध, घी और मिश्री मिलाकर शालि चावलोंका भात
खाय । कम्पवातको दूर करनेके लिये रोगीको सदैव वायुरहित स्थानमें
निवास करावे । इसके सेवन करनेसे तीन पक्षमें कम्पवात रोग नष्ट
होता है । इसको द्विगुणाख्यरस कहते हैं ॥ १-३ ॥
वातगजाङ्कुश ।
मृतं सूतं मृतं लौहं ताप्यं गन्धकतालकम् ।
पथ्या भृङ्गी विषं व्योषमग्निमन्थञ्च टङ्कणम् ॥ ४ ॥
तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्यं मुण्डीनिर्गुण्डिकाद्रवैः ।
द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ॥ ५ ॥
कणाचूर्णयुतञ्चैव जिंगीक्वाथं पिबेदनु ।
साध्यासाध्यं निहन्त्याशु रसो वातगजांकुशः ॥ ६॥
सप्ताहाद्गृध्रसीं हन्ति दारुणं सन्निपातिकम् ।
क्रोष्टुशीर्षकवातञ्चाप्यपबाहुकसंज्ञकम् ॥ ७ ॥