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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 366

( ३४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
अथापस्माररोगचिकित्सा ।
भूतभैरव रस ।
मृतसूतार्कलौहानां शिलागन्धकतालकम् ।
रसाञ्जनं च तुल्यांशं नरमूत्रेण मर्दयेत् ॥ १ ॥
तद्गोलं द्विगुणं गन्धं लौहपात्रे क्षणं पचेत् ।
पञ्चगुञ्जामितं खादेदपस्मारहरं परम् ॥ २ ॥
हिंगु सौवर्चलं व्योषं नरमूत्रेण सर्पिषा ।
कर्षमात्रं पिबेच्चानु रसोऽयं भूतभैरवः ॥ ३ ॥
रससिन्दूर, तांबा, लोहा, मैनशिल, गंधक, हरिताल और रसोत इन
सब औषधियोंको एकत्र मनुष्यके मूत्रमें पीसकर गोलासा बना लेवे ।
फिर सब औषधिसे दुगुना गंधक मिलाकर लोहेके पात्रमें क्षणभर
पकावे । इस औषधिमेंसे पांच रत्ती परिमाण सेवन करनेसे अपस्मार
रोग दूर होता है । और ऊपरसे हींग, काला नमक, त्रिकुटा, इनको
नरमूत्र और घृत इनमें पीसकर भक्षण करे । इसको भूतभैरव रस
कहते हैं ॥ १-३ ॥
सूतभस्म प्रयोग ।
शङ्खपुष्पी वचा ब्राह्मी कुष्ठमेलारसैः सह ।
सूतभस्मप्रयोगोऽयं रक्तिकाद्वयमानतः ॥
सर्वापस्मारनाशाय महादेवेन भाषितः ॥ ४ ॥
शंखाहुली, वच, ब्राह्मी, कूठ और इलायचीके रसके साथ दो
रत्ती परिमाण रससिन्दूरके सेवन करनेसे सर्व प्रकारका अपस्मार
नष्ट होता है ॥ ४ ॥
इन्द्रब्रह्मवटी ।
मृतसूताभ्रकं तीक्ष्णं तारं ताप्यं विषं समम् ।
पद्मकेशरसंयुक्तं दिनैकं मर्दयेद्द्रवैः ॥ ५ ॥