रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३३९ )
सर्वांस्तान्नाशयत्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ।
चतुर्भुजरसो नाम महेशेन प्रकाशितः ॥ २६ ॥
रससिन्दूर २ भाग, सोनेकी भस्म १ भाग, मैनशिल १ भाग,
कस्तूरी १ भाग और हरिताल १ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र
करके घीक्वारके रसमें एक दिनतक खरल करे, फिर इसका गोलासा
बनाकर एरण्डके पत्तोंमें लपेटकर धानोंके ढेरमें रख देवे; पश्चात् तीन
दिनके उपरान्त निकालकर सब रोगोंमें प्रयोग करे । यह उत्तम
औषधि यथोचितमात्रानुसार त्रिफलेके काथ और सहतके साथ सेवन
करनेसे वलीपलित, अपस्मार, ज्वर, खाँसी, शोष, मन्दाग्नि, क्षय,
हस्तकम्प, शिरःकम्प और शरीरकम्पप्रभृति रोग नष्ट होते हैं । इसका
वातज, पित्तज और सम्पूर्ण कफके रोगोंमें प्रयोग करे । सर्व प्रकारकी
वमन विरेचन और मन्त्रौषधिके द्वारा जो रोग शमन नहीं होते वे
रोग इस औषधिके भक्षण करनेसे वज्राहत वृक्षके समान अवश्य नष्ट हो
जाते हैं । यह चतुर्भुजरस स्वयं महादेवने कहा है ॥ २०-२६ ॥
उन्मादपर्पटी रस ।
कृष्णधुस्तूरजैर्बीजैः पञ्चभिः पर्पटीरसः ।
सम्प्रयोज्यः प्रशान्त्यर्थमुन्मादं भूतसम्भवम् ॥२७॥
इत्युन्मादाधिकारः ।
काले धतूरेके पांच बीजोंको पित्तपापड़ेके रसमें पीसकर सेवन
करनेसे भूतोन्माद रोग नष्ट होता है । इसको उन्मादपर्पटी रस
कहते हैं ॥ २७ ॥
इत्युन्मादाधिकारः ।