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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 584 में से

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पृष्ठ 361

भाषाटीकासहित । ( ३३५ )
मर्दयेत्रिदिनं सर्वं वल्लमात्रं प्रयोजयेत् ।
दोषोन्मादं द्रुतं हन्ति भूतोन्मादविशेषतः ॥ ३ ॥
शुद्ध पारा और शुद्ध ताम्रको समानभाग लेकर तीन दिन तक धतू-
रेके पत्तोंके रसमें, तीन दिन तक ब्रह्मदण्डीके रसमें और तीन तक
कुचिलेके रसमें भावना देकर चक्रिका बना लेवे । फिर पारेकी बरा-
बर गन्धक लेकर चक्रिकाको गंधकके बीचमें रखकर लघुपुट दे जिससे
गंधक जल जाय और पारा न उडे ऐसे ५-७ वार करनेसे ताम्र और पारेका
बन्धन होजायगा । इसतरह बन्धन करनेके पश्चात् धतूरेके बीज, अभ्रक,
गन्धक और विष यह प्रत्येक उसके समान भाग लेकर एकत्र तीन
दिनतक खरल करे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधिसे दोषजनित
और भूतजनित उन्माद रोग नष्ट होता है । इसको उन्मादगजां-
कुश रस कहते हैं ॥ १-३ ॥
भूतांकुश रस ।
सूतायस्ताम्रमभ्रञ्च मुक्ता चापि समं समम् ।
सूतपादोत्तमं वज्रं शिलागन्धकतालकम् ॥ ४ ॥
तुत्थं रसाञ्जनं शुद्धमहिफेनं शिलाञ्जनम् ।
पञ्चानां लवणानाञ्च प्रतिभागं रसोन्मितम् ॥ ५ ॥
भृङ्गराजचित्रवज्रीदुग्धेनापि विमर्दयेत् ।
दिनान्ते पिण्डिकां कृत्वा रुद्धा गजपुटे पचेत् ॥६॥
भूतांकुशो रसो नाम नित्यं गुञ्जाद्वयं लिहेत् ।
आर्द्रकस्य रसेनापि भूतोन्मादनिवारणम् ॥ ७ ॥
पिप्पल्याक्तं पिबेच्चानु दशमूलकषायकम् ।
स्वेदयेत्कटुतुम्ब्या च तीक्ष्णं रूक्षञ्च वर्जयेत् ॥ ८ ॥
माहिषञ्च घृतं क्षीरं गुर्वन्नमपि भक्षयेत् ।
अभ्यङ्गः कटुतैलेन हितो भूतांकुशे रसे ॥ ९ ॥