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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 584 में से

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पृष्ठ 360

( ३३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
अथ दाहचिकित्सा ।
सूतात्पञ्चार्कतश्चैकं कृत्वा पिण्डं सुशोधनम् ।
जम्बीरस्वरसैर्मर्द्यं सूततुल्यञ्च गन्धकम् ॥ १ ॥
नागवल्लीदलैः पिष्ट्वा ताम्रपत्रीं प्रलेपयेत् ।
प्रपुटेद्भूधरे यन्त्रे यावद्भस्मत्वमाप्नुयात् ॥ २ ॥
द्विगुञ्जामाईकद्रावैरूषणेन च योजयेत् ।
निहन्ति दाहसन्तापं मूर्च्छा पित्तसमुद्भवाम् ॥ ३ ॥
इति दाहाधिकारः ।
पारा ५ भाग और तांबाभस्म १ भाग इन दोनों औषधियोंको
जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करे; फिर इसमें पांच भाग गन्धक मिला
लेवे और इसको पानोंके रसमें भावना देकर कल्क बनाकर उस कल्कसे
तांबेके पत्रमें लेप कर देवे; फिर इसको भूधर यंत्रमें भस्म कर लेवे ।
दो रत्ती परिमाण इस औषधिको अदरखके रस और त्रिकुटेके चूर्णके
साथ सेवन करनेसे दाहजनित सन्ताप और पित्तजनित मूर्च्छा
दूर होती है ॥ १-३ ॥
इति दाहचिकित्सा ।
अथ उन्मादरोगचिकित्सा ।
उन्मादगजांकुश रस ।
त्रिदिनं कनकद्रावैर्महाराष्ट्रीद्रवैः पुनः ।
विषमुष्टिजलैः सूतं समुत्थाप्यार्कचक्रिकाम् ॥ १ ॥
कृत्वा तप्तां सगन्धां तां युक्त्या बन्धनमाचरेत् ।
तत्समं कानकं बीजमभ्रकं गन्धकं विषम् ॥ २ ॥