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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 352

( ३२६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
श्वासकासचिन्तामणि रस ।
पारदं माक्षिकं स्वर्णं समांशं परिकल्पयेत् ।
पारदार्द्धं मौक्तिकञ्च सूताद्विगुणगन्धकम् ॥
अभ्रञ्चैव तथा योज्यं व्योम्नो द्विगुणलौहकम् ॥ १९॥
कण्टकारीरसेनैव छागीदुग्धैः पृथक् पृथक् ।
मधुयष्टिरसेनैव पर्णपत्ररसेन च ॥ २० ॥
भावयेत्सप्तवारञ्च द्विगुञ्जां वटिकां भजेत् ।
पिप्पलीमधुसंयुक्तां श्वासकासविमर्दिनीम् ॥ २१॥
पारा, सोनामाखीभस्म और सोनाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक
एक भाग, मोती आधा भाग, गंधक २ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग
और लोहभस्म ४ भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके
कटेरीके रस, बकरीके दूध, मुलैठीके रस और पानोंके रसमें अलग
अलग सात २ भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। पीपलके
चूर्ण और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे खाँसी और श्वास
दूर होते हैं। इसको श्वासकासचिन्तामणि रस कहते हैं ॥ १९-२१॥
अन्य श्वासकुठार रस ।
रसं गन्धं विषं टङ्कं शिलोषणकटुत्रयम् ।
सर्वं संमर्द्य दातव्यो रसः श्वासकुठारकः ॥
वातश्लेष्मसमुद्भूतं श्वासं कासं क्षयं जयेत् ॥ २२ ॥
पारा, गंधक, विष, सुहागा, मैनशिल, काली मिरच और त्रिकुटा
यह सब औषधि समान भाग लेकर पीसकर सेवन करनेसे वात-
कफोत्पन्न रोग, श्वास, खाँसी और क्षयरोग नष्ट होते हैं। इसको
श्वासकुठार रस कहते हैं ॥ २२ ॥
अन्य श्वासकुठार रस ।
रसं गन्धं विषञ्चैव टङ्कणं समनःशिलम् ।