रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३३५ )
उक्त लोहपर्पटीमें लोहेके स्थानमें तांबेका प्रयोग करनेसे अर्थात्
उपरोक्त विधिसे पर्पटीको बनाकर केवल उसमें लोहेके स्थानमें तांबेको
डाले तो ताम्रपर्पटी होती है ॥ १५ ॥
पिप्पल्यादि लोह ।
पिप्पल्यामलकी द्राक्षा कोलास्थि मधु शर्करा ।
विडङ्गपुष्करैर्युक्तं लौहं हन्ति सुदारुणम् ॥
छर्दिं हिक्कां तथा तृष्णां त्रिरात्रेण न संशयः ॥१६॥
पीपल, आमले, दाख, बेरकी मींगी, मुलैठी, मिश्री, वायविडंग
और पोहकरमूल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और लोह-
भस्म आठ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित
मात्रासे तीन दिन तक सेवन करनेसे वमन, हिचकी और तृषारोग शांत
होते हैं । इसको पिप्पल्यादि लोह कहते हैं ॥ १६ ॥
श्वासकुठार रस ।
टङ्कणं पारदं गन्धं विषं शिला कटुत्रिकम् ।
निष्पिष्य वटिका कार्या बाणगुञ्जाप्रमाणतः ॥१७॥
उष्णोदकं पिबेच्चानु क्षुद्राक्वाथमथापि वा ।
कासं पञ्चविधं हन्ति श्वासं श्लेष्मसमुद्भवम् ॥
शिरोरोगं निहन्त्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥१८॥
सुहागा, शुद्ध पारा, गंधक, विष, मैनाशिल और त्रिकुटा यह प्रत्येक
औषधि समान लेकर सबको एकत्र पीसकर पांच पांच रत्तीकी गोली
बना लेवे । इस औषधिको गर्म जलके साथ; अथवा कटेरीके क्वाथके
साथ सेवन करनेसे खाँसी, कफोत्पन्न श्वास और सब प्रकारका शिरो-
रोग इसप्रकार नष्ट होते हैं जिस प्रकार वज्रसे वृक्षोंका ध्वंस होता
है । इसको श्वासकुठार रस कहते हैं ॥ १७ ॥ १८ ॥